लोटा भंटा मेले में श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़, वरूणा के कछार में दगा अहरा

लोटा भंटा मेले में श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़, वरूणा के कछार में दगा अहरा

Newspoint24/ संवाददाता /एजेंसी इनपुट के साथ

वाराणसी । मार्गशीर्ष (अगहन) महीने की षष्ठी तिथि पर गुरूवार को हरहुआ स्थित रामेश्वर महादेव मंदिर परिसर और वरूणा के कछार में प्रसिद्ध लोटा-भंटा मेला लगा। मेले में आये हजारों श्रद्धालुओं ने वरुणा नदी में आस्था की डुबकी लगायी और रामेश्वर महादेव मंदिर में हाजिरी लगाई।

इसके बाद मंदिर से लेकर आस-पास के खलिहान, बगिचों और धर्मशालाओं में अहरा लगाकर लोगों ने दाल-बाटी-चोखा पूरे उत्साह के साथ बनाया। पहले रामेश्वर महादेव को भोग लगाने के बाद लोगों ने इसे ग्रहण किया।

खाने पीने के बाद लोगों ने दानपुण्य कर मेले का आनंद उठाया। पूरे मेला परिसर में पुलिस अफसर भी श्रद्धालुओं की सुरक्षा में लगातार फोर्स के साथ गश्त करते रहे। मेले में वाराणसी सहित पूर्वांचल के कई जिलों के अलावा दूसरे प्रदेशों से भी लोग पहुंचे हैं।

हजारों निसंतान श्रद्धालु परिवार सहित बुधवार की शाम ही मेला क्षेत्र में पहुंच चुके थे। पूरी रात वरूणा के कछार में खुले आसमान के नीचे गुजारी और तड़के ही वरूणा नदी में स्नान घ्यान के बाद अहरा, गोहरी की आंच पर खीर, दाल, बाटी-चोखा बनाया और इस प्रसाद को रामेश्वर महादेव को अर्पित किया।

महादेव से वंश वृद्धि के लिए गुहार लगायी। लोटा भंटा के मेले में बच्चों ने चरखी, सिनेमा, जादू व सुपर ड्रैगन, मिक्की माउस का खूब आनंद उठाया।

-भगवान राम ने एक मुट्ठी रेत से शिवलिंग की स्थापना की थी

लोटा भंटा मेले को लेकर मान्यता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने यहां वरुणा नदी की एक मुट्ठी रेत से शिवलिंग की स्थापना की थी। भगवान शिव और मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम का मिलन स्थल को रामेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।

महापराक्रमी दशानन रावण वध के बाद भगवान श्रीराम को ब्रह्महत्या का पाप लग गया, जिसका प्रायश्चित करने के लिए श्रीराम ने अन्न का त्याग किया। भगवान श्रीराम काशी आए और यहां एक मुट्ठी रेत का शिवलिंग बनाकर एक लोटा जल चढ़ाया। यहीं बाटी-चोखा बनाकर महादेव को भगवान राम ने भोग लगाया। प्रसाद खाने के बाद भगवान ने अपना व्रत तोड़ा। तभी से रामेश्वर महादेव आस्था का केंद्र बन गया।

काशी में ही मान्यता है कि रामेश्वर महादेव की पूजा कर बाटी-चोखा का प्रसाद चढ़ाने वाले नि:संतान दम्पति को संतान की प्राप्ति होती है।

ये भी मान्यता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव जब परम गति पाने के लिए निकले तो वह भी यहां पहुंचे थे। लेकिन, उन्होंने रामेश्वर महादेव पर रात नहीं बिताई थी। इससे रामेश्वर महादेव नाराज हो गए।

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पता चलने पर पांडव प्रायश्चित के लिए यहां लौटे। वरुणा नदी में स्नान के बाद रामेश्वर महादेव की पूजा की और फिर बाटी चोखे का प्रसाद बनाया।

मंदिर के महंत अनूप तिवारी बताते हैं कि पंचकोशी यात्रा में इस स्थान का काफी धार्मिक महत्व है। काशी में रामेश्वर, काशी पंचक्रोशी के तृतीय पड़ाव स्थल पर बसा हुआ है।

राधा-कृष्ण मंदिर के महंत राममूर्ति दास उर्फ मद्रासी बाबा के अनुसार पंचकोशी तीर्थ धाम में अगहन छठ को लगने वाले प्रसिद्ध लोटा- भंटा मेला में आदि गंगा वरुणा नदी में स्नान कर रामेश्वर महादेव के दर्शन पूजन से कामना पूर्ण होती है। प्रसाद के रूप में यहां बाटी -चोखा, दाल बनाकर भोले बाबा को चढ़ाने के बाद लोग खाते हैं।

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