वाराणसी : काशी में संतों ने लिया बड़ा फैसला,वंचितों को भी धर्म की मुख्य धारा में जोड़ेंगे

अखिल भारतीय संत समिति की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक सम्पन्न

साधुओं के साथ होने वाले किसी भी अनैतिक कृत्य के खिलाफ एकजुटता का संकल्प

Newspoint24.com/newsdesk/ 

वाराणसी । अखिल भारतीय संत समिति ने संकल्प लिया है कि समाज के वंचितों को भी धर्म की मुख्य धारा में जोड़ने का कार्य प्रमुखता से करेंगे। अनाथ और कमजोर बच्चों को अपनी परम्परा से जोड़कर अपने धर्म स्थानों को मजबूत करना होगा। साथ ही साधुओं के साथ होने वाले किसी भी अनैतिक कृत्य के खिलाफ अब संत समाज को एकजुट होना पड़ेगा। 

दुर्गाकुंड स्थित हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय में आयोजित संत समिति के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक के अन्तिम दिन रविवार को संतों ने दो प्रस्ताव भी पारित किया। बैठक में उत्तराखंड सरकार से प्रस्ताव के जरिये संतों ने मांग किया कि वीतराग संत ब्रह्मलीन वामदेव जी की प्रतिमा हरिद्वार, ऋषिकेश के चौक पर पुन: स्थापित किया जाये। वर्ष 2016 में राष्ट्रीय राजमार्ग के पुनर्निर्माण के दौरान राज्य सरकार और निर्माण एजेंसियों द्वारा पूज्य संतों को आश्वासन देकर चौक से मूर्ति हटा दी गई। परन्तु पुन: अब तक स्थापित नहीं की गई। काशी में धर्मार्थ कार्य मंत्रालय का महानिदेशालय स्थापित करने, लव जिहाद से हिन्दू बहन-बेटियों को बचाने के लिए विशेष धर्मांतरणरोधी अध्यादेश लाने पर संतों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का विशेष आभार जताया। 

बैठक में संतों ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के कुशल प्रबंधन में अयोध्या में वाल्मीकि रामायण में वर्णित अयोध्या के मूल स्वरूप को वापस लाने से लेकर अयोध्या के दिव्यतम एवं भव्यतम विकास का कार्य हो रहा है। उत्तर प्रदेश के अन्य तीर्थस्थल यथा मथुरा, वृंदावन, चित्रकूट, नैमिशारण्य, शुक्रताल, देवीपाटन आदि सभी तीर्थों के सम्यक् विकास का जो खाका राज्य सरकार ने खींचा है। इसके लिए सरकार बधाई का पात्र है। 

बैठक में समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी अविचल दास ने कहा कि समिति की शक्ति का प्रभाव सम्पूर्ण भारत पर है। हम सभी को सामूहिक शक्ति के प्रयासों द्वारा संतों का सम्मान बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। 

समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद ने बैठक में कहा कि देश में इतिहास के पुनर्निर्माण का दौर है।  जिसमें सनातन सभ्यता के पुनर्लेखन का कार्य गति पर है। हम सभी के सामूहिक योगदान द्वारा सनातन धर्म व संस्कृति के विस्तार को गति मिलेगी,  जिससे इस संस्कृति पर प्रतिघात करने वाले आक्रांताओं का मनोबल टूटेगा और सनातन धर्म का अभ्युदय होगा। आगामी 14 जनवरी से 15 दिनों का मेरा प्रवास समाज के कमजोर वर्गों व दलितों के घर होगा। संत समिति के संरक्षक जगद गुरू रामानंदाचार्य राजराजेश्वराचार्य ने बैठक में मैं भारत हूं...मैं भारत हूं... सभ्यता का पुरोधा हूं... की पंक्तियां गुनगनाई। 

बैठक की अध्यक्षता करते हुए ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने कहा कि कई बार सरकारें भी हिन्दू मान्यताओं को लेकर विरोधाभास की स्थिति में रही है। क्योंकि मुस्लिमों, ईसाइयों के संस्थानों और सम्पत्ति के स्रोतों पर कभी-भी दृष्टिपात नहीं करती। यह हमारे हिन्दू सनातन संस्कृति के लिए अच्छी दृष्टि नहीं है। 

बैठक में संत तजेंदर सिंह ने भी विचार रखा। इस दौरान आयोजन में प्रमुख रूप से योगदान देने वाले बृजेश पाठक, गोविंद शर्मा, मयंक कुमार, विनय तिवारी, अजय उपाध्याय को सम्मानित भी किया गया। 

बैठक में इन संतों की रही उपस्थिति

संतों के दो दिवसीय बैठक के अन्तिम दिन आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी बालकानन्द गिरि, महन्त फूलडोल बिहारीदास, स्वामी धर्मदेव, महन्त कमलनयन दास, महामंडलेश्वर अनन्तदेव गिरि, महन्त सुरेंद्रनाथ अवधूत, स्वामी देवेन्द्रानन्द गिरि, महामण्डलेश्वर जनार्दन हरि, स्वामी हंसानन्द तीर्थ, अखिल भारतीय संत समिति के संयुक्त महामंत्री महामण्डलेश्वर स्वामी मनमोहनदास (राधे-राधे बाबा), ब्रह्मर्षि अंजनेशानन्द सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती, महामंडलेश्वर ज्योतिर्मयानंद गिरि, महामंडलेश्वर ईश्वरदास,शक्ति शांतानंद महर्षि, महन्त गौरीशंकर दास, महन्त ईश्वर दास, पातालपुरी मठ के पीठाधीश्वर महंत बालकदास आदि संतों की खास उपस्थिति रही। 

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