तिब्बती परम्परा की विशिष्ट पूजा से जुड़े अमेरिका व यूरोप के हजारों लोग

Newspoint24 / newsdesk

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कुशीनगर । उत्तरप्रदेश के कुशीनगर जिले में स्थित बुद्ध के महापरिनिर्वाण स्थल पर हो रही तिब्बती परम्परा की एक विशिष्ट पूजा ''फामा निंथिक द्रुपछें'' से एप के माध्यम से दुनिया के दस देशों के हजारों लोग जुड़ गए हैं। पूजा से जुड़ने वालों में एशिया सहित अमेरिका व यूरोप के देशों के लोग भी शामिल हैं। नौ दिवस तक 24 घण्टे होने वाली यह पूजा महामारी, आतंकवाद, युद्ध से होने अशांति को समाप्त कर दुनिया को मानवता व कल्याण के मार्ग की ओर ले चलने के लिए की जा रही है।

शुक्रवार से प्रारम्भ होकर दस दिवस तक होने वाली यह पूजा शनिवार को समाप्त होगी। कुशीनगर में स्थित बिरला मंदिर में हिमांचल प्रदेश के चोकलिंग बुद्धिस्ट मोनास्ट्री कांगड़ा में निवास करने वाले तिब्बती मूल के 36 सदस्यीय लामाओं के दल द्वारा यह पूजा की जा रही है। वरिष्ठ लामा रिंपोछे ओजेन तोब्जे की सतत निगरानी में हो रही इस पूजा में अमेरिका,इटली,फ्रांस,जर्मनी,ऑस्ट्रेलिया, ताइवान,हांगकांग,रूस,नेपाल,भूटान स्थित केंद्रों पर मौजूद हजारों बौद्ध अनुयायी प्रतिभाग कर रहे हैं।

तोब्जे ने बताया कि तिब्बती परम्परा के वज्रयान सम्प्रदाय की यह उच्च स्तर की पूजा है। इस पूजा में भगवान बुद्ध के समक्ष शक्ति की देवी तारा की पूजा की जाती है। भारत में सारनाथ व श्रावस्ती के बाद कुशीनगर में यह पूजा हो रही है। दो दशक से विश्व के 10 देशों के अनेक स्थानों पर यह पूजा सम्पन्न हो चुकी है। कुशीनगर में पूजा सम्पन्न होने के बाद मुख्य गुरु आगे की पूजा की तिथि व स्थान का निर्णय करेंगे।

इस सम्बंध में इतिहासकार वीरेंद्र तिवारी बताते हैं कि ''वज्रयान'' बुद्धिज्म का विशेष रूप है। यूरोप व अमेरिका के देशों में बुद्धिज्म के पुनर्जागरण का दौर चल रहा है। एशिया के देशों के अलावा वहां के लोग भी बुद्धिज्म को अपना रहे हैं। ''फामा निंथिक द्रुपछें'' पूजा की शैली भारतीय हिन्दू व बौद्ध परम्परा की मिली-जुली शैली है। इस पूजा में दसों दिशाओं व नवग्रहों, अग्नि, पृथ्वी, वायु व जल का आह्वान किया जाता है। महायान व वज्रयान हिमालयन सर्किट में प्रचलित है। अतीत में इस सर्किट में भगवान शिव की पूजा होती है। बाद में बुद्धिज्म आया तो पूजा विधि में हिन्दू शैली भी परिलक्षित होती है।

हिन्दुस्थान समाचार

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