झारखंड : सजा रजरप्पा मां छिन्नमस्तिके दरबार, श्रद्धालुओं की उमड़ रही भीड़

झारखंड : सजा रजरप्पा मां छिन्नमस्तिके दरबार, श्रद्धालुओं की उमड़ रही भीड़

Newspoint24 /newsdesk /एजेंसी इनपुट के साथ

 
रामगढ़ । झारखंड का एकमात्र सिद्ध पीठ रजरप्पा मां छिन्नमस्तिके दरबार इन दिनों श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। लगभग दो वर्षों के बाद यहां पुजारियों और श्रद्धालुओं ने बड़े उत्साह के साथ शारदीय नवरात्र पर आयोजन किए हैं।

पिछले वर्ष कोरोना की वजह से मंदिर का प्रांगण काफी सूना रहा था। इस बार झारखंड कोरोना के खिलाफ जंग लगभग जीत चुका है। इसका असर रजरप्पा मंदिर में भी दिख रहा है। कोलकाता और उड़ीसा के कलाकारों ने मां छिन्नमस्तिके दरबार को बड़ी सुंदर आकृति दी है। दूसरे प्रदेशों से मंगाए गए फूलों से इस मंदिर को सजाया गया है। रविवार को सजे हुए मंदिर को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचे। शारदीय नवरात्र के मौके पर अगले छह दिनों तक यह मंदिर प्रांगण फूलों की खुशबू से महकता रहेगा। यहां कई प्रदेशों के श्रद्धालु दर्शन करने आएंगे।

रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्तिके मंदिर आस्था की धरोहर है। असम के कामाख्या मंदिर के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात मां छिन्नमस्तिका या छिन्नमस्तिके मंदिर काफी लोकप्रिय है। रजरप्पा का यह सिद्धपीठ केवल एक मंदिर के लिए ही विख्यात नहीं है। छिन्नमस्तिके मंदिर के अलावा यहां महाकाली मंदिर, सूर्य मंदिर, दस महाविद्या मंदिर, बाबाधाम मंदिर, बजरंग बली मंदिर, शंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर के नाम से कुल सात मंदिर हैं। पश्चिम दिशा से दामोदर तथा दक्षिण दिशा से कल-कल करती भैरवी नदी का दामोदर में मिलना मंदिर की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है। दामोदर और भैरवी के संगम स्थल के समीप ही मां छिन्नमस्तिके का मंदिर स्थित है। मंदिर की उत्तरी दीवार के साथ रखे एक शिलाखंड पर दक्षिण की ओर मुख किए माता छिन्नमस्तिके का दिव्य रूप अंकित है।

मां छिन्नमस्तिके की महिमा की कई कथाएं प्रचलित हैं। प्राचीनकाल में छोटा नागपुर में रज नामक एक राजा राज करते थे। राजा की पत्नी का नाम रूपमा था। इन्हीं दोनों के नाम से इस स्थान का नाम रजरूपमा पड़ा, जो बाद में रजरप्पा हो गया। यहां भक्त बिना सिर वाली देवी मां की पूजा करते हैं और मानते हैं कि मां भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। मान्यता है कि असम स्थित मां कामाख्या मंदिर सबसे बड़ी शक्तिपीठ है, जबकि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शक्तिपीठ रजरप्पा स्थित मां छिन्नमस्तिके मंदिर ही है।

मंदिर के वरिष्ठ पुजारी असीम पंडा ने बताया कि वैसे तो यहां साल भर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है, लेकिन शारदीय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि के समय भक्तों की संख्या बढ़ जाती है। मंदिर के अंदर जो देवी काली की प्रतिमा है, उसमें उनके दाएं हाथ में तलवार और बाएं हाथ में अपना ही कटा हुआ सिर है। शिलाखंड में मां की तीन आंखें हैं। बायां पैर आगे की ओर बढ़ाए हुए वह कमल पुष्प पर खड़ी हैं। पांव के नीचे विपरीत रति मुद्रा में कामदेव और रति शयनावस्था में हैं।

मां छिन्नमस्तिके का गला सर्पमाला तथा मुंडमाल से सुशोभित है। बिखरे और खुले केश, आभूषणों से सुसज्जित मां नग्नावस्था में दिव्य रूप में हैं। दाएं हाथ में तलवार तथा बाएं हाथ में अपना ही कटा मस्तक है। इनके अगल-बगल डाकिनी और शाकिनी खड़ी हैं, जिन्हें वह रक्तपान करा रही हैं और स्वयं भी रक्तपान कर रही हैं। इनके गले से रक्त की तीन धाराएं बह रही हैं।
 

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