भारत के गौरवशाली इतिहास को गलत व्याख्यायित किया गया : प्रान्त प्रचारक

भारत के गौरवशाली इतिहास को गलत व्याख्यायित किया गया : प्रान्त प्रचारक

Newspoint24 / newsdesk

कुशीनगर । जिले के हाटा स्थित किसान डिग्री कालेज परिसर में चल रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्राथमिक संघ शिक्षा वर्ग (आईटीसी) के तीसरे दिन स्वयंसेवकों को प्रान्त प्रचारक सुभाष जी का पाथेय मिला। इस दौरान उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास गौरवशाली रहा है। इसके लेखन में गलतियां तो हुईं हैं, व्याख्या भी गलत की गई है।

11 सितम्बर से शुरू होकर 18 सितम्बर तक आयोजित इस कैम्प में भाग ले रहे 86 स्वयंसेवकों से प्रान्त प्रचारक ने कहा कि आरएसएस का हर प्रशिक्षण न सिर्फ जीवन की गूढ़ता को समझाता है बल्कि जीवन में चलना, बोलना, मिलना, उठाना और बैठने का प्रशिक्षण शामिल कर जीवन सरल और सरस बनाता है।

पहली बार सात दिनों के लिए घर छोड़ने वाले स्वयंसेवकों में आत्मविश्वास भरते हुए प्रान्त प्रचारक ने कहा कि हमारा भारत वर्ष गौरवशाली है। जीवन की सरलता को समझाने के लिए की गई गुरुकुल की व्यवस्था हुई थी। मन में ऊंच-नीच के भाव को जगने के पूर्व ही यहां इस भावना के जगने के सभी दरवाजे बंद हो जाते थे। भिक्षाटन कर शिक्षा ग्रहण करने वाले शिक्षार्थी न सिर्फ गरीबी को जान लेता था बल्कि एक राजा का पुत्र अपनी गरीब जनता के साथ सहृदयता से व्यवहार करना भी सिखाता था। ब्रह्मचारी के ''भिक्षामि देहि'' की आवाज पर दरवाजे के सामने निकलने वाली महिला के उस भाव को भी समझाया, जो एक विशेष योग्यता हासिल करने की प्रक्रिया में शामिल युवा के लिए उठता है।

भारत को सपेरों का देश लिखे जाने पर भी उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि शायद उन्हें पता ही नहीं था कि यह भी र्क तरह ज्ञान है और ऐसे विषैले जीव-जंतुओं के विष से भी जीवन सरल-सरस बनाता है। इनके विष से आज भी जीवनरक्षक दवाएं बनती हैं। भालू और बंदर को उंगलियों पर नाचना भारतीयों के ''सर्वे भवन्तु सुखिनः'', सर्वे संतु निरामया:'' की भावना को दर्शाता है। भारत को संगीत से परिचित कराने वाले भगवान नारद और माता सरस्वती की वीणा ने दुनिया को वह विधा दी, जिसके बल पर आज संगीत का प्रयोग एक औषधि के रूप में किया जा रहा है।

आर्यों को बाहरी बताने वाले इतिहासकारों को भी उन्होंने अड़े हाथों लिया। मध्य एशिया के देशों ईरान, इराक, सीरिया, सऊदी अरब, ओमान, तुर्किस्तान, अफगानिस्तान आदि का नाम गिनाते हुए उन्होंने इनकी कार्य-संस्कृति की तुलना की और कहा निश्चित रूप से कोई भी कार्य इनकी वर्तमान की संस्कृति और सभ्यता से सहमति नहीं रखेगा। फिर आर्यों के मध्य एशिया से भारत आने का सिद्धांत ही पूरी तरह गलत है।

महाचंडी, महालक्ष्मी, नव दुर्गा आदि मातृशक्तियों की चर्चा करते हुए कहा कि कन्या पूजन जैसी परंपरा का विधान केवल भारत में ही है। कन्याओं के पैर धोने और पूजने की व्यवस्था ही बताती है कि श्रेष्ठ आर्य, भारत के ही थे।

वर्ष 1498 में वास्कोडिगामा द्वारा भारत की खोज की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि साल 1025 में मोहम्मद गौरी ने भारत सोमनाथ पर आक्रमण किया था। अब आप खुद विचार कीजिये कि कौन सा इतिहास सत्य है। वास्कोडिगामा का इतुहस सत्य माना जाय अथवा मुहम्मद गोरी का?

इस दौरान उन्होंने भास्कराचार्य और उनकी पुत्री लीलावती, खगोलशास्त्री आर्यभट्ट की उपलब्धियों को भी बताया। अरस्तू को एक गंवार बताते हुए कहा कि वह सूरज को पृथ्वी की परिक्रमा करने वाला बताया था। इसके अलावा उन्होंने प्राचीन भारतीय वस्त्र उद्योग, शिक्षा व्यवस्था, गिनती गिनने की पद्धति, शून्य और दशमलव की उत्पत्ति तथा बोधायन ऋषि के यज्ञ बनाने की विधा के बारे में विस्तार से चर्चा की।

इस मौके पर जिला संघचालक चंद्रशेखर सिंह, सह-प्रान्त कार्यवाह विनय, जिला प्रचारक आलोक, सेवा भारती के डॉ. मनोज जैन, सुरेंद्र, जनार्दन आदि उपस्थित रहें।

हिन्दुस्थान समाचार

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