विश्व में कुल मनोरोगों का 15 प्रतिशत मानसिक रोगी भारत में

Newspoint24 / newsdesk

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बीकानेर । वर्तमान में जिंदगी की भागदौड़ एवं रिश्तों में तनाव के कारण मानसिक रोगों ने विकराल रुप धारण कर लिया है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि मनोरोगी के अंदर सोचने-समझने क्षमता समाप्त हो जाती है एवं उसका जजमेंट, पर्सनैलिटी, कॉन्टैक्ट विद रियलिटी एंड इनसाइट लॉस हो जाती है जिसके कारण उसे कुछ समझ में नहीं आता है और परिवारजन उसे बेकार मानते हैं। विश्व में कुल मनोरोगों का 15 प्रतिशत मानसिक रोगी भारत मेें है तथा भारत की कुल आबादी का 9 प्रतिशत हिस्सा मानसिक रोगों से ग्रसित है।

यह जानकारी रविवार को विश्व मानसिक दिवस के उपलक्ष्य में वरदान हॉस्पिटल एवं रिसर्च सेंटर के मनोचिकित्सक डॉ. सिद्धार्थ असवाल ने एनआर असवाल चैरिटेबल संस्था के संयुक्त तत्वावधान में 'मिशन फ्रीडम' का शुभारम्भ के मौके पर कही। इस अवसर पर विधायक नोखा बिहारीलाल बिश्नोई, डा. सत्यप्रकाश आचार्य, पूर्व संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल ने भी शिरकत कर पोस्टर का विमोचन किया। डॉ. असवाल ने बताया कि हमारे देश में 4 हजार मनोचिकित्सक है जबकि 66 हजार मनोचिकित्सक की जरुरत है जिसके कारण सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत मानसिक रोगियों को ही इलाज मिल पाता है। शेष 80 से 85 प्रतिशत को मानसिक रोगों का इलाज नहीं मिल पाता है। जिसे मेंटल हेल्थ गेप कहते हैं। उन्होंने बताया कि मानसिक रोगों के प्रति पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह के कारण अधिकतर व्यक्ति मानसिक रोगों के इलाज हेतू या तो झाड़-फूंक या टोना टोटका करते हैं या फिर कुछ लोग इसको अपना भाग्य मानकर स्वीकार कर लेते हैं तथा उचित उपचार के अभाव में जिंदगीभर मानसिक रोगी को घर मेें बेडिय़ों में जकड़ देते हैं या फिर घर के किसी कोने में बंद कर देते हैं। जिस कारण मानव को नरकिए एवं पशुवत जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ता है। संस्था के मनोचिकित्सक डॉ. सिद्धार्थ असवाल द्वारा विश्व मानसिक दिवस के मौके पर मिशन फ्रीडम शुभारम्भ मौके जो पूरे वर्ष तक मानसिक रोगियों को बेडिय़ों से मुक्त करवाकर उनका घर जाकर, फ्री में इलाज कर उनको समाज की मुख्य धारा से जोडऩे का प्रण लिया गया है।

हिन्दुस्थान समाचार

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