दुर्गा मंदिर दुर्गाकुंड वाराणसी में भव्य वार्षिक श्रृंगार , श्रद्धालुओं की उमड़ी भारी भीड़  

durga mata mandir

newspoint24 / newsdesk  

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वाराणसी।  दुर्गा मंदिर दुर्गाकुंड वाराणसी , में माँ दुर्गा का वार्षिक श्रृंगार किया गया इस अवसर पर मंदिर परिसर में भव्य श्रृंगार किया गया। वार्षिक श्रृंगार के उपलक्ष्य में आयोजित कत्थक नृत्य कार्यक्रम में देश भर से आये कलाकारों ने माता मंदिर प्रांगण में मनमोहक प्रस्तुति से दर्शकों को रोमांचित कर दिया। जगत जननी भगवती दुर्गा माता मंदिर के प्रांगण में हो रहे वार्षिक श्रृंगार कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों ने उपस्थित होकर माता के दर्शन पूजन किया। दुर्गा मंदिर वाराणसी के प्रमुख लोगों में पंडित राजनाथ दुबे, विकास दुबे, पशुपतिनाथ दुबे एवं पंडित बेचन त्रिपाठी और प्रेम शंकर त्रिपाठी ने मंदिर में उपस्थित सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान सभी का अभिवादन और धन्यवाद प्रस्तुत किया।  गौरतलब है कि कोरोना काल के पश्चात राज्य में सभी धार्मिक स्थलों को खोल दिया गया है इसी के तहत दुर्गाकुंड वाराणसी में भी राज्य सरकार के द्वारा जारी कोविड-19 के प्रोटोकाल का उचित पालन किया गया जा रहा है। मंदिर प्रांगण में आ रहे सभी श्रद्धालुओं से मंदिर प्रशासन ने अनुरोध किया  है कि दर्शन पूजा के दौरान निश्चित दूरी और मास्क का प्रयोग अनिवार्य रूप से करें। 

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दुर्गा मंदिर दुर्गाकुंड वाराणसी का इतिहास 

दुर्गा मंदिर काशी के पुरातन मंदिरों में से एक है। इस मंदिर का उल्लॆख " काशी खंड" में भी मिलता है। यह मंदिर वाराणसी कैन्ट से लगभग 5 कि॰मी॰ की दूरी पर है। लाल पत्थरों से बने अति भव्य इस मंदिर के एक तरफ "दुर्गा कुंड" है। इस कुंड को बाद में प्रशासन ने सुसज्जित कर दिया। इस मंदिर में माँ दुर्गा "यंत्र" रूप में विरजमान है। यह कुंड पहले गंगा से जुड़ा हुआ था। माना जाता है कि यहां देवी माता की मूर्ति स्वयंभू प्रकट हुई थी। इस मंदिर में देवी का तेज इतना भीषण है मां के सामने खड़े होकर दर्शन करने मात्र से ही कई जन्मों के पाप जलकर भस्म हो जाते हैं। मां दुर्गा का यह मंदिर नागर शैली में निर्मित किया गया। इस मंदिर स्थल पर माता भगवती के प्रकट होने का संबंध अयोध्या के राजकुमार सुदर्शन की कथा से जुड़ा है। 

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इस मंदिर में बाबा भैरोनाथ, लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी, एवं माता काली की मूर्ति रूप में अलग से मंदिर है। यहाँ मांगलिक कार्य मुंडन इत्यादि में माँ के दर्शन के दूर दराज से लोग  आतॆ है। मंदिर के अंदर हवन कुंड है, जहाँ रोज हवन होते हैं। कुछ लोग यहाँ तंत्र पूजा भी करते हैं। सावन महिने में एक माह का बहुत मनमोहक मेला लगता है। एक कथा के अनुसार मान्यता है कि शुम्भ-निशुम्भ का वध करने के बाद मां दुर्गा ने थककर दुर्गाकुण्ड स्थित मंदिर में ही विश्राम किया था। मंदिर के नजदीक आनंद पार्क है, जहाँ पर आर्य समाज का प्रथम सास्त्रार्थ काशी के विद्वानों के साथ हुआ था। नवरात्रि सावन तथा मंगलवार और शनिवार को इस मंदिर में भक्‍तों की काफी भीड़ रहती है। 

कहा जाता है की इस मंदिर का निर्माण १८ वी शताब्दी में बंगाल की रानी भवानी ने करवाया था। 

कुक्कुटेश्वर महादेव के दर्शन के बिना नहीं पूरी भक्तों की पूजा

मंदिर से जुड़ा एक अन्य कथानक इसकी विशिष्टता को प्रतिपादित करता है। घटना प्राचीन काल की है एक बार काशी क्षेत्र के कुछ लुटेरों ने इस मंदिर में देवी दुर्गा के दर्शन कर संकल्प लिया था कि जिस कार्य के लिए वह जा रहे हैं, यदि उसमें सफलता मिली तो वे मां आद्य शक्ति को नरबलि चढ़ाएंगे। मां की कृपा से उन्हें अपने कार्य में सफलता मिली और वे मंदिर आकर बलि देने के लिए ऐसे व्यक्ति को खोजने लगे जिसमें कोई दाग न हो। तब उन्हें मंदिर के पुजारी ही बलि के लिए उपयुक्त नजर आये। जब उन्होंने पुजारी से यह बात कहते हुए उनको बलि के लिए पकड़ा तो पुजारी बोले- जरा रुक जाओ जरा मैं माता रानी की नित्य पूजा कर लूं, फिर बलि चढ़ा देना।

पूजा के बाद ज्यों ही लुटेरों ने पुजारी की बलि चढ़ायी, तत्क्षण माता ने प्रकट होकर पुजारी को पुनर्जीवित कर दिया व वर मांगने को कहा। तब पुजारी ने माता से कहा कि उन्हें जीवन नहीं, उनके चरणों में चिरविश्राम चाहिए। माता प्रसन्न हुई और उन्होंने वरदान दिया कि उनके दर्शन के बाद जो कोई भी उस पुजारी का दर्शन नहीं करेगा, उसकी पूजा फलित नहीं होगी। इसके कुछ समय बाद पुजारी ने उसी मंदिर प्रांगण में समाधि ली, जिसे आज कुक्कुटेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।

पौराणिक मान्यता के मुताबिक जिन दिव्य स्थलों पर देवी मां साक्षात प्रकट हुईं वहां निर्मित मंदिरों में उनकी प्रतिमा स्थापित नहीं की गई है ऐसे मंदिरों में चिह्न पूजा का ही विधान हैं। दुर्गा मंदिर भी इसी श्रेणी में आता है। यहां प्रतिमा के स्थान पर देवी मां के मुखौटे और चरण पादुकाओं का पूजन होता है। साथ ही यहां यांत्रिक पूजा भी होती है। यही नहीं, काशी के दुर्गा मंदिर का स्थापत्य बीसा यंत्र पर आधारित है। बीसा यंत्र यानी बीस कोण की यांत्रिक संरचना जिसके ऊपर मंदिर की आधारशिला रखी गयी है।

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