कौन मुसलमानों को बेवजह डराए रखना चाहता है 

कौन मुसलमानों को बेवजह डराए रखना चाहता है

आर.के. सिन्हा

सच में कभी-कभी ऐसा लगता है कि अपने देश में कुछ विक्षिप्त मानसिकता के लोगों को सिर्फ गलत ढंग से मुसलमानों को मजबूर या मजलूम दिखाने का शौक चढ़ गया है। वे मुसलमानों को हर वक्त एक विक्टिम के रूप में पेश करते रहना चाहते हैं। यह सब करने के मूल में उनका कोई राजनीतिक एजेंडा सधता है। अब ताजा मामला ही लें। हाल ही में चंडीगढ़ के एक गैर सरकारी संगठन ने जनहित याचिका दाखिल करते हुए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में जजों के रिक्त पदों का मुद्दा बनाते हुए कहा कि इसमें 1956 से अबतक कोई मुस्लिम समुदाय का जज नहीं बना है। इसलिए याचिकाकर्ता ने यह दलील दी कि किसी मुस्लिम को भी जज नामित किया जाए। जैसी उम्मीद थी जनहित याचिका को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। यदि माननीय न्यायालय ने सिरफिरे याचिकाकर्ता पर कोई मोटा दंड भी लगाया होता तो और बेहतर होता।

यहां सवाल यह है कि अगर इस तरह की दलीलों के आधार पर ही देश चलने लगा तो फिर कोई हिन्दू भी यह कहेगा कि उसे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड या वक्फ बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया जाए? मतलब इस तरह की मांगें तो कभी खत्म ही नहीं होंगी। चलिए एक मिनट के लिए मान भी लें कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का जज कोई मुसलमान नामित हो तो फिर यह बहस चालू हो जाएगी कि क्या वह महिला हो, मुसलमानों के पसमांदा समाज से हो, शिया हो, सुन्नी हो, देवबंदी हो, बरेलवी हो आदि। इस तरह की याचिका करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि वे किस सोच के आधार पर ऐसी बेतुकी याचिका दाखिला करते हैं? उनसे यह भी पूछा जाए कि आजाद भारत में कभी कोई मुसलमान प्रधानमंत्री या सेनाध्यक्ष भी नहीं बना है तो क्या इन दो अहम पदों पर भी किसी मुसलमान को नामित किया जाए? उन्हें ही क्यों किया जाए ? क्या देश के बाकी नागरिकों या समुदायों के बारे में न सोचा जाए। क्या पारसी, सिख, बौद्ध, ईसाई, हिन्दू, यहूदी, नास्तिक आदि इस देश के नागरिक नहीं हैं? क्या उनकी हमेशा अनदेखी होती रहे?

दरअसल मुसलमानों के मसलों को उठाने वाले शक्तिशाली नेता, लेखक, पत्रकार वगैरह अपने समाज के सबसे पिछड़े (अजलाफ़) और अरजाल (दलित) को लेकर तो कतई गंभीर नहीं रहते। ये भारतीय मुसलमानों की कुल आबादी का कम-से-कम 85 फीसद हैं। पसमांदा आंदोलन मुसलमानों के पिछड़े और दलित तबकों की नुमाइंदगी करता है और उनके मुद्दों को उठाता भी है। यह भारत की मुख्यधारा के मुसलमानों की अकलियती सियासत को अशराफिया (अगड़ी जाति के मुसलमान) राजनीति मानता है और उसे चुनौती देता है। आगे बढ़ने से पहले जान लेते हैं आखिर क्या हैं अशराफिया राजनीति ? यह मुसलमानों की अगड़ी जातियों की राजनीति है जो कि सिर्फ कुछ जज्बाती मुद्दों को ही उठाते हैं। यह अभीतक मोटा-मोटी उर्दू, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, पर्सनल लॉ इत्यादि को ही उठाते रहे हैं। ये ही बाबरी मस्जिद के सवाल भी पिछले बीस वर्षों से गर्मा रहे थे। अगर भारत में मुसलमानों की आबादी कुल आबादी की 13.4 फीसद (जनगणना, 2001) है, तो अशराफिया आबादी मात्र 2.1 फीसद (जो कि मुसलमान आबादी के 15 फीसद हैं) के आसपास होगी। हालांकि, लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व 4.5 प्रतिशत है जो कि उनकी आबादी प्रतिशत के दोगुने से भी ज्यादा है।

साफ़ है कि इस तरह की मुस्लिम सियासत से मुसलमानों के किस तबके को लाभ मिल रहा है। हैरानी होती है कि अपने को मुसलमानों का हमदर्द कहने वाले कभी पसमांदा मुसलमानों, औरतों, शिक्षा, महंगाई या रोजगार के सवालों पर सड़कों पर नहीं उतरते। याद नहीं आ रहा कि इन्होंने देश के मुसलमानों को कभी महंगाई, बेरोजगारी या अपने-अपने इलाकों में नए-नए स्कूल, कॉलेज या अस्पताल खुलवाने आदि की मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया हो। आपको एक भी इस तरह का उदाहरण याद नहीं आएगा जब मुसलमान अपने मूल और बुनियादी सवालों पर आंदोलनरत हुए हों। क्या इनके लिए महंगाई, निरक्षरता या बेरोजगारी जैसे सवाल अब पूरी तरह गौण हो चुके हैं? मुसलमानों को इनके धार्मिक और सियासी रहनुमा क्या अंधकार युग में ही रखना चाहते हैं। ये भी अपने को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं। क्या कभी मुसलमान दलितों, आदिवासियों या समाज के अन्य कमजोर वर्गों के हितों में आगे आए हैं? कभी नहीं।

ये बात-बात पर गुजरात दंगों की बात करना तो नहीं भूलते। पर यह गोधरा के दिल दहलाने वाले योजनाबद्ध आपराधिक जघन्य संहार को याद नहीं करते। क्या ये कभी कश्मीर में इस्लामिक कट्टरपंथियों के हाथों मारे गए पंडितों के लिए भी बोले या लड़े? क्या दिल्ली में जब 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का नरसंहार हो रहा था तब ये सिखों को बचाने के लिए भी आगे आए थे? ये सारी बातें इतिहास के पन्नों में दर्ज है। इन्हें अपने को हमेशा विक्टिम की स्थिति में रखना-बताना और दुनिया के सामने पेश करने में ही अच्छा लगता है। ये सिर्फ अपने अधिकारों की बातें करते हैं। ये कर्तव्यों की चर्चा करते ही हत्थे से उखड़ जाते हैं।

दरअसल आज के दिन कुछ लोगों ने देश का वातावरण इस हद तक विषाक्त कर रखा है कि एक टीवी एंकर की मौत पर एक खास धर्म के लोग सोशल मीडिया पर जश्न मनाते हैं। अब विश्व की प्राचीनतम और अति वैज्ञानिक संस्कृत भाषा को भी सांप्रदायिकता के चश्मे से देखा जाने लगा है। आपको याद होगा कि केन्द्रीय विद्यालयों में सुबह होने वाली प्रार्थना पर भी कुछ दिन पहले निशाना साधा गया। कहा गया कि यह धर्मनिरपेक्ष भारत में नहीं होनी चाहिए। देखिए कि कब केन्द्रीय विद्यालय के ध्येय वाक्य पर भी सवाल खड़े किए जाएंगे। इस प्रार्थना के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दाखिल हो चुकी है।

काश, याचिकाकर्ता को पता होता कि विश्व के बड़े इस्लामिक देश इंडोनेशिया की जलसेना का ध्येय वाक्य भी संस्कृत में है। जब उस इस्लामिक मुल्क को संस्कृत से परहेज नहीं है, तब भारत में संस्कृत की प्रार्थना पर बवाल किस कारण से खड़ा किया गया। भारत की आम जनता को अब इन तत्वों से सावधान रहना होगा, जो मुसलमानों में डर का भाव पैदा रखना चाहते हैं और अपना राजनीतिक स्वार्थ साधना चाहते हैं, चाहे देश की सुख-शांति भाड़ में जाये।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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