विक्रमशिला विद्यापीठ से वैश्विक स्तर तक हिंदी यात्रा !

विक्रमशिला विद्यापीठ से वैश्विक स्तर तक हिंदी यात्रा !

newspoint 24 / newsdesk 

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

  डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

हिंदी को जन्म की या फिर आत्मा की भाषा कहे तो गलत नही होगा।हिंदी को वैश्विक स्तर की भाषा बनाने में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ का अभूतपूर्व योगदान अभूतपूर्व है।हिंदी को साथ लेकर यह पीठ अपने आगोश में शिक्षा का भी स्वर्णिम  इतिहास समेटे हुए है।सन 775 से सन 800 ईसवी तक पाल वंश के शासक रहे राजा धर्मपाल द्वारा स्थापित इस पुरातन विश्वविद्यालय ने अपनी हिंदीमयी शिक्षा के उच्चतर मानदण्डों को छूते हुए विश्व स्तर पर प्रतिष्ठा प्राप्त की।वर्तमान में भी इस विश्वविद्यालय के भग्नावशेष व विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ नाम से भारतीय अधिनियम के तहत पंजीकृत होकर यह पीठ दुनियाभर में हिंदी  सेवा का अभियान चला रही है।

इसी के अंतर्गत जिन महान लोगो ,संस्थाओं व आंदोलनों के समय हिंदी आगे बढ़ी उन सबको को सामने लाने और हिंदी का एक स्वर्णिम इतिहास रचने का भी लक्ष्य चल रहा है।हिंदी को सिर्फ भारत की भाषा हम नही कह सकते।वस्तुतः हिंदी मे अ, आ,इ, ई,ओ,उ,के जो स्वर गूंजते है ,वही स्वर नवजात शिशु के रुदन से भी गूंजते है। दुनिया के सभी नवजात शिशुओं के रुदन की ध्वनि एक ही प्रकार की है।जिसमे हिंदी की ध्वनि सुनाई देती है।इसलिए हम कह सकते है कि हिंदी हर मानव के जन्म की भाषा है।चाहे फिर वह किसी भी देश या प्रांत का व्यक्ति क्यो न हो।

  स्वतंत्रता संग्राम के समय भी हिंदी स्वाधीनता सेनानियों के सम्पर्क की भाषा रही,तभी तो हिंदी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभाषा कहलाई और उसने यह सम्मान प्राप्त भी किया।हिंदी के लिए राष्ट्रभाषा शब्द कोई संवैधानिक शब्द नहीं है, बल्कि यह प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है।

राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक शर्त देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है।

राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्क–भाषा होती है। जिसका व्यापक जनाधार होता है।राष्ट्रभाषा हमेशा स्वभाषा ही हो सकती है क्योंकि उसी के साथ जनता का भावनात्मक लगाव होता है।राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है।हिंदी दीर्घकाल से  देश में जन–जन के पारस्परिक सम्पर्क की भाषा रही है। यह केवल उत्तरी भारत की नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के आचार्यों वल्लभाचार्य, रामानुज, रामानंद ,शंकराचार्य आदि ने भी इसी भाषा के माध्यम से अपने मतों का प्रचार किया था। अहिंदी भाषी राज्यों के भक्त–संत कवियों जैसे—असम के शंकरदेव, महाराष्ट्र के ज्ञानेश्वर व नामदेव, गुजरात के नरसी मेहता, बंगाल के चैतन्य आदि ने इसी भाषा को अपने धर्म और साहित्य का माध्यम बनाया था।जनता और सरकार के बीच संवाद  के क्रम में जब फ़ारसी या अंग्रेज़ी के माध्यम से परेशानी हुई तो अंग्रेजों ने फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में हिंदी विभाग खोलकर अधिकारियों को हिंदी सिखाने की व्यवस्था की। यहाँ से हिंदी पढ़े हुए अधिकारियों ने भिन्न–भिन्न क्षेत्रों में उसका प्रत्यक्ष लाभ देकर मुक्त कंठ से हिंदी को सराहा। सी. टी. मेटकाफ़ ने 1806 ई. में अपने  गुरु जॉन गिलक्राइस्ट को लिखा— 'भारत के जिस भाग में भी मुझे काम करना पड़ा है, कलकत्ता से लेकर लाहौर तक, कुमाऊँ के पहाड़ों से लेकर नर्मदा नदी तक मैंने उस भाषा का आम व्यवहार देखा है, जिसकी शिक्षा आपने मुझे दी है। मैं कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक या जावा से सिंधु तक इस विश्वास से यात्रा करने की हिम्मत कर सकता हूँ कि मुझे हर जगह ऐसे लोग मिल जाएँगे जो हिन्दुस्तानी बोल लेते होंगे।'

टॉमस रोबक ने 1807 ई. में लिखा— 'जैसे इंग्लैण्ड जाने वाले को लैटिन सेक्सन या फ़्रेंच के बदले अंग्रेज़ी सीखनी चाहिए, वैसे ही भारत आने वाले को अरबी–फ़ारसी या संस्कृत के बदले हिन्दुस्तानी यानि हिंदी सीखनी चाहिए।'विलियम केरी ने 1816 ई. में लिखा— 'हिंदी किसी एक प्रदेश की भाषा नहीं बल्कि देश में सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है।'

एच. टी. कोलब्रुक ने लिखा— 'जिस भाषा का व्यवहार भारत के प्रत्येक प्रान्त के लोग करते हैं, जो पढ़े–लिखे तथा अनपढ़ दोनों की साधारण बोलचाल की भाषा है, जिसको प्रत्येक गाँव में थोड़े बहुत लोग अवश्य ही समझ लेते हैं, उसी का यथार्थ नाम हिंदी है।'

जार्ज ग्रियर्सन ने हिंदी को 'आम बोलचाल की महाभाषा' कहा है।

 हिंदी की व्यावहारिक उपयोगिता, देशव्यापी प्रसार एवं प्रयोगगत लचीलेपन के कारण अंग्रेज़ों ने हिंदी को अपनाया। उस समय हिंदी और उर्दू को एक ही भाषा माना जाता था। अंग्रेज़ों ने हिंदी को प्रयोग में लाकर हिंदी की महती संभावनाओं की ओर राष्ट्रीय नेताओं एवं साहित्यकारों का ध्यान खींचा था।

ब्रह्म समाज  के संस्थापक राजा राममोहन राय ने सन 1828 में कहा, इस समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है। ब्रह्मसमाजी केशव चंद्र सेन ने 1875 ई. में एक लेख लिखा, भारतीय एकता कैसे हो, 'जिसमें उन्होंने लिखा— उपाय है सारे, भारत में एक ही भाषा का व्यवहार। अभी जितनी भाषाएँ भारत में प्रचलित हैं, उनमें हिंदी भाषा लगभग सभी जगह प्रचलित है। यह हिंदी अगर भारतवर्ष की एकमात्र भाषा बन जाए तो यह काम सहज ही और शीघ्र ही सम्पन्न हो सकता है। एक अन्य ब्रह्मसमाजी नवीन चंद्र राय ने पंजाब में हिंदी के विकास के लिए स्तुत्य योगदान दिया।

आर्य समाज  के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती गुजराती भाषी थे एवं गुजराती व संस्कृत के अच्छे जानकार थे। हिंदी का उन्हें सिर्फ़ कामचलाऊ ज्ञान था, पर अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए तथा देश की एकता को मज़बूत करने के लिए उन्होंने अपना सारा धार्मिक साहित्य हिंदी में ही लिखा। उनका कहना था कि हिंदी के द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। वे इस 'आर्यभाषा' को सर्वात्मना देशोन्नति का मुख्य आधार मानते थे। उन्होंने हिंदी के प्रयोग को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। वे कहते थे, 'मेरी आँखें उस दिन को देखना चाहती हैं, जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा समझने और बोलने लग जाएँगे।

महर्षि अरविन्द घोष की सलाह थी कि 'लोग अपनी–अपनी मातृभाषा की रक्षा करते हुए सामान्य भाषा के रूप में हिंदी को ग्रहण करें।'

 एनी बेसेंट ने कहा था, "भारतवर्ष के भिन्न–भिन्न भागों में जो अनेक देशी भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें एक भाषा ऐसी है जिसमें शेष सब भाषाओं की अपेक्षा एक भारी विशेषता है, वह यह कि उसका प्रचार सबसे अधिक है। वह भाषा हिंदी है। हिंदी जानने वाला आदमी सम्पूर्ण भारतवर्ष में यात्रा कर सकता है और उसे हर जगह हिंदी बोलने वाले मिल सकते हैं। भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।"

 राष्ट्रीय स्तर पर संवाद स्थापित करने के लिए हिंदी आवश्यक है।  हिंदी बहुसंख्यक जन की भाषा है, एक प्रान्त के लोग दूसरे प्रान्त के लोगों से सिर्फ़ इस भाषा में ही विचारों का आदान–प्रदान कर सकते हैं। भावी राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को बढ़ाने का कार्य  समाज सुधारकों ने किया।

सन 1885 ई. में स्थापित कांग्रेस का राष्ट्रीय आंदोलन जैसे जैसे ज़ोर पकड़ता गया, वैसे–वैसे राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय झण्डा एवं राष्ट्रभाषा के प्रति आग्रह बढ़ता ही गया।1917 ई. में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कहा, "यद्यपि मैं उन लोगों में से हूँ, जो चाहते हैं और जिनका विचार है कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।" तिलक ने भारतवासियों से आग्रह किया कि वे हिंदी सीखें।

महात्मा गाँधी राष्ट्र के लिए राष्ट्रभाषा को नितांत आवश्यक मानते थे। उनका कहना था, "राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।" गाँधीजी हिंदी के प्रश्न को स्वराज का प्रश्न मानते थे— "हिंदी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।" उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में सामने रखकर भाषा–समस्या पर गम्भीरता से विचार किया। 1917 ई. में भड़ौंच में आयोजित गुजरात शिक्षा परिषद के अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए गाँधीजी ने कहा, राष्ट्रभाषा के लिए 5 लक्षण या शर्तें होनी चाहिए—अमलदारों के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए।यह आवश्यक है कि भारतवर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हों।उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का अपनी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवहार होना चाहिए।राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए।

उस भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्पस्थायी स्थिति पर ज़ोर नहीं देना चाहिए।"

वर्ष 1918 ई. में हिंदी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए गाँधी जी ने राष्ट्रभाषा हिंदी का समर्थन किया, "मेरा यह मत है कि हिंदी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए।" इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि प्रतिवर्ष 6 दक्षिण भारतीय युवक हिंदी सीखने के लिए प्रयाग भेजें जाएँ और 6 उत्तर भारतीय युवक को दक्षिण भाषाएँ सीखने तथा हिंदी का प्रसार करने के लिए दक्षिण भारत में भेजा जाए। इन्दौर सम्मेलन के बाद उन्होंने हिंदी के कार्य को राष्ट्रीय व्रत बना दिया। दक्षिण में प्रथम हिंदी प्रचारक के रूप में गाँधीजी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास गाँधी को दक्षिण में चेन्नई भेजा। गाँधीजी की प्रेरणा से मद्रास में सन 1927 ई. में एवं वर्धा में सन 1936 ई. में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएँ स्थापित की गईं।

वर्ष 1925 ई. में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में गाँधीजी की प्रेरणा से यह प्रस्ताव पारित हुआ कि 'कांग्रेस का, कांग्रेस की महासमिति का और कार्यकारिणी समिति का काम–काज आमतौर पर हिंदी में चलाया जाएगा।' इस प्रस्ताव में हिंदी–आंदोलन को बड़ा बल मिला।

वर्ष 1927 ई. में गाँधीजी ने लिखा, "वास्तव में ये अंग्रेज़ी में बोलने वाले नेता हैं, जो आम जनता में हमारा काम जल्दी आगे बढ़ने नहीं देते। वे हिंदी सीखने से इंकार करते हैं, जबकि हिंदी द्रविड़ प्रदेश में भी तीन महीने के अन्दर सीखी जा सकती है।

सन 1927 ई. में सी. राजगोपालाचारी ने दक्षिण वालों को हिंदी सीखने की सलाह दी और कहा, "हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा तो है ही, यही जनतंत्रात्मक भारत में राजभाषा भी होगी।"

सन 1928 ई. में प्रस्तुत नेहरू रिपोर्ट में भाषा सम्बन्धी सिफ़ारिश में कहा गया था, "देवनागरी अथवा फ़ारसी में लिखी जाने वाली हिन्दुस्तानी भारत की राष्ट्रभाषा होगी, परन्तु कुछ समय के लिए अंग्रेज़ी का उपयोग ज़ारी रहेगा।" सिवाय 'देवनागरी या फ़ारसी' की जगह 'देवनागरी' तथा 'हिन्दुस्तानी' की जगह 'हिंदी' रख देने के अंततः स्वतंत्र भारत के संविधान में इसी मत को अपना लिया गया।

सन 1929 ई. में सुभाषचंद्र बोस ने कहा, "प्रान्तीय ईर्ष्या–द्वेष को दूर करने में जितनी सहायता इस हिंदी प्रचार से मिलेगी, उतनी दूसरी किसी चीज़ से नहीं मिल सकती। अपनी प्रान्तीय भाषाओं की भरपूर उन्नति कीजिए, उसमें कोई बाधा नहीं डालना चाहता और न हम किसी की बाधा को सहन ही कर सकते हैं। पर सारे प्रान्तों की सार्वजनिक भाषा का पद हिंदी को ही मिला है।"

सन 1931 ई. में महात्मा गाँधी ने लिखा, "यदि स्वराज्य अंगेज़ी–पढ़े भारतवासियों का है और केवल उनके लिए है तो सम्पर्क भाषा अवश्य अंग्रेज़ी होगी। यदि वह करोड़ों भूखे लोगों, करोड़ों निरक्षर लोगों, निरक्षर स्त्रियों, सताए हुए अछूतों के लिए है तो सम्पर्क भाषा केवल हिंदी हो सकती है।" गाँधीजी जनता की बात जनता की भाषा में करने के पक्षधर थे।

सन 1936 ई. में गाँधीजी ने कहा, "अगर हिन्दुस्तान को सचमुच आगे बढ़ना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही बन सकती है, क्योंकि जो स्थान हिंदी को प्राप्त है, वह किसी और भाषा को नहीं मिल सकता है।"

सन 1937 ई. में देश के कुछ राज्यों में कांग्रेस मंत्रिमंडल गठित हुआ। इन राज्यों में हिंदी की पढ़ाई को प्रोत्साहित करने का संकल्प लिया गया।जैसे–जैसे स्वतंत्रता संग्राम तीव्रतम होता गया वैसे–वैसे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का आंदोलन ज़ोर पकड़ता गया। 20वीं सदी के चौथे दशक तक हिंदी राष्ट्रभाषा के रूप में आम सहमति प्राप्त कर चुकी थी। सन 1942 से 1945 का समय ऐसा था जब देश में स्वतंत्रता की लहर सबसे अधिक तीव्र थी, तब राष्ट्रभाषा से ओत–प्रोत जितनी रचनाएँ हिंदी में लिखी गईं उतनी शायद किसी और भाषा में इतने व्यापक रूप से कभी नहीं लिखी गई। राष्ट्रभाषा प्रचार के साथ राष्ट्रीयता के प्रबल हो जाने पर अंग्रेज़ों को भारत छोड़ना पड़ा।जापान में हिंदी एक कैरियर के रूप में देखी जाती है।जापान की युवा पीढ़ी दुनिया के सबसे बड़े बाजार भारत मे व्यापार के लिए हिंदी सीखने को जरूरी मानते है।

तभी जापान में हिंदी सीखने का क्रेज इतना अधिक है कि प्रायः हर विश्वविद्यालय व कालेज में हिंदी विभाग खुल गया है जहां हिंदी पढाने के लिए भारतीय अध्यापको की सेवाएं ली जाती है।जापान में हिंदी अध्यापक रह चुके ऋतुपुर्ण बताते है कि जापान के हिंदी विद्यार्थी फर्राटे के साथ हिंदी बोलते ओर समझते है।हिंदी को संयुक्त अरब अमीरात में मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक भाषा का सम्मान प्राप्त है। हिंदी  भारत में लगभग 4.25 करोड़ लोगों की पहली भाषा है और करीब 12 करोड़ लोगों की दूसरी भाषा है। हिंदी का नाम फारसी शब्द "हिंद" से लिया गया है, जिसका अर्थ है "सिंधु नदी की भूमि है।" फारसी बोलने वाले तुर्क जिन्होंने गंगा के मैदान और पंजाब पर आक्रमण किया था, 11वीं शताब्दी की शुरुआत में सिंधु नदी के किनारे बोली जाने वाली भाषा को "हिंदी" नाम दिया था।दुनिया के बहुत से ऐसे देश है जहां 'हिंदी' बोली जाती है। 

नेपाल में हिंदी भाषी लोगों का दूसरा सबसे बड़ा समूह है। लगभग आठ मिलियन नेपाली हिंदी भाषा बोलते हैं। हालांकि, एक बड़ी आबादी द्वारा हिंदी बोली जाने के बावजूद, नेपाल में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता नहीं है। 2016 में सांसदों ने हिंदी भाषा को एक राष्ट्रीय भाषा के रूप में शामिल करने की मांग की थी।जो पूरी नही हो पाई।

इसी तरह संयुक्त राज्य अमेरिका हिंदी भाषी लोगों के तीसरे सबसे बड़े समूह का देश है। लगभग 650, 000 लोग यहां हिंदी भाषा बोलते हैं, जो हिंदी को संयुक्त राज्य में 11वीं सबसे लोकप्रिय विदेशी भाषा बनाती है। हालांकि, अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व के कारण हिंदी भाषा बोलने वाले ज्यादातर इसका प्रयोग अपने या फिर दूसरे हिंदी भाषियों के घर पर करते हैं। संयुक्त राज्य में हिंदी के मूल वक्ता बहुत कम हैं, जिनमें से अधिकांश भारत के अप्रवासी हैं।

मॉरीशस के एक तिहाई लोग हिंदी भाषा बोलते हैं। देश का संविधान राष्ट्रीय भाषा को स्पष्ट नहीं करता है, हालांकि अंग्रेजी और फ्रेंच संसद की आधिकारिक भाषा हैं। अधिकांश मॉरीशस मूल भाषा के रूप में मॉरीशस क्रियोल बोलते हैं।फिर भी हिंदी वहां सिर चढ़कर बोलती है।

 हिंदी भारतीयों मजदूरों के फिजी में  आगमन के बाद अस्तित्व में आई। फिजी में ये उत्तर पूर्वी भारत से आए, जहां अवधी, भोजपुरी और कुछ हद तक मगही बोलियां बोली जाती थीं। इन बोलियों को उर्दू के साथ जोड़ा गया, जिसके परिणामस्वरूप एक नई भाषा का निर्माण हुआ, जिसे शुरू में फिजी बाट के रूप में जाना जाता था। हिंदी न्यूजीलैंड में "चौथी सबसे अधिक बोली जाने वाली" भाषा है। दोनों देशों के बीच बढ़ते सांस्कृतिक संबंध हिंदी अपनाने की बड़ी वजह है।वही जर्मनी में तो कई दशकों से हीडलबर्ग, लीपजिग और बॉन सहित विश्वविद्यालयों और शहरों में हिंदी और संस्कृत पढ़ाई जा रही है।

हिंदी की इसी विरासत को साथ लेकर विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के पदाधिकारी और शुभचिंतक जहां अपने इस पुरातन विश्वविद्यालय के भग्नावशेषों को संरक्षित करने के लिए प्रयत्नशील है,वही हिंदी संसार की पहली भाषा बने इसके लिए भी देश विदेश में हिंदी की अलख जगाने का कार्य किया जा रहा है।इस संस्था के स्वर्णिम रहे इतिहास के अंदर झांके तो पता चलता है,

विक्रमशिला विश्वविद्यालय बिहार राज्य के भागलपुर जनपद में स्थापित रहा है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के राजा धर्मपाल ने सन 775 से 8सन 800 ई०  के मध्य की थी।  अपनी स्थापना के  बाद से ही इस विश्वविद्यालय ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर ली थी।  तिब्बत के साथ इस विश्वविद्यालय का प्रारम्भ से ही विशेष सम्बंध रहा है। विक्रमशिला विश्वविद्यालय में विद्याध्ययन के लिए आने वाले तिब्बत के विद्वानों के लिए अलग से एक अतिथिशाला हुआ करती थी। विक्रमशिला से अनेक विद्वान तिब्बत गए थे तथा वहाँ उन्होंने कई ग्रन्थों का तिब्बती भाषा में अनुवाद भी किया। इन विद्वानों में सबसे  प्रसिद्ध दीपंकर श्रीज्ञान थे जो उपाध्याय अतीश के नाम से विख्यात रहे हैं। उस समय विक्रमशिला का पुस्तकालय बहुत समृद्ध था। विक्रमशिला विश्वविद्यालय में बारहवीं शताब्दी में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों की संख्या तीन हजार होना इसकी लोकप्रियता का प्रमाण थी। विश्वविद्यालय के कुलपति ६ भिक्षुओं की एक समिति की सहायता से प्रबंधन व्यवस्था  देखते थे। कुलपति के अधीन ४ विद्वान पंडितो की एक परिषद प्रवेश लेने हेतु आये विद्यार्थियों की परीक्षा लेती थी।

इस विश्वविद्यालय में व्याकरण, न्याय, दर्शन और तंत्र के अध्ययन की विशेष व्यवस्था थी।  बंगाल के शासक शिक्षा पूरी होने पर विद्यार्थियों को उपाधि देते थे। 

यहाँ बौद्ध धर्म और दर्शन के अतिरिक्त न्याय, तत्त्वज्ञान, व्याकरण आदि की भी शिक्षा दी जाती थी। विद्यार्थियों की सुविधा के लिए पुस्तकें उपलब्ध कराई जाती थीं तथा उनकी जिज्ञासाओं का समाधान विद्वान आचार्यों द्वारा किया जाता था। यहाँ देश से ही नहीं विदेशों से भी विद्याध्ययन के लिए छात्र आते थे। शिक्षा समाप्ति के बाद विद्यार्थी को उपाधि प्राप्त होती थी जो उसके विषय की दक्षता का प्रमाण मानी जाती थी। पूर्व मध्ययुग में विक्रमशिला विश्वविद्यालय के अतिरिक्त कोई शिक्षा केन्द्र इतना महत्त्वपूर्ण नहीं था कि सुदूर प्रान्तों के विद्यार्थी जहाँ विद्या अध्ययन के लिए जाएँ। इसीलिए यहाँ छात्रों की संख्या बहुत अधिक थी।  इस विश्वविद्यालय के विद्वानों ने विभिन्न ग्रंथों की रचना की, जिनका बौद्ध साहित्य और इतिहास में आज भी नाम है। इन विद्वानों में रक्षित, विरोचन, ज्ञानपाद, बुद्ध, जेतारि रत्नाकर शान्ति, ज्ञानश्री मिश्र, रत्नवज्र और अभयंकर आदि शामिल है। दीपंकर नामक विद्वान ने तो लगभग २०० ग्रंथों की रचना की थी। वह इस विश्वविद्यालय के महान प्रतिभाशाली विद्वानों में से एक थे। सन 1203 ई० में बख्तियार खिलजी ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय को नेस्तनाबूद कर दिया था। जिसकारण इस विश्वविद्यालय को लम्बे समय तक उपेक्षित रहना पड़ा।यहां तक कि मुगलकाल और फिर ब्रिटिश काल मे भी विक्रमशिला विश्वविद्यालय अतीत के पन्नो में ही समाया रहा।हॉलाकि विश्वविद्यालय के भग्नावशेष रह रहकर इस विश्वविद्यालय के स्वर्णिम इतिहास की गवाही दे रहे थे।

समय ने करवट बदली और देश आजाद हुआ तो इस पुरातन संस्था को विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के रूप में पुनर्जीवित कर हिंदी के उत्थान की पहल की गई।अनेक नामचीन साहित्यकारों ने विद्यापीठ के साथ जुड़कर इसकी प्रतिष्ठा को चार चांद लगाये।,तभी तो आज भी यह विद्यापीठ देश विदेश में हिंदी को प्रतिस्थापित करने का संसाधनों के अभाव के बावजूद पुनीत प्रयास कर रही है।विद्यापीठ के अधिष्ठाता जाने माने हिंदी विद्वान डॉ योगेंद्र नाथ शर्मा अरुण,कुलपति डॉ तेजनारायण कुशवाह व कुलसचिव डॉ देवेंद्र नाथ शाह अपनी पीठ की विद्वत परिषद की सलाह पर हिंदी सेवियो को सम्मानित कर उन्हें प्रोत्साहित करने का अभियान चलाए हुए है ,इसी अभियान के कारण आज हिंदी सम्रद्ध और विकसित होकर अपने वैश्विक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो रही है।(लेखक विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के अवैतनिक उपकुलसचिव है)

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

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