सावरकर जी का हिन्दुत्व, विवेकानंद का हिन्दुत्व ऐसा बोलने का फैशन हो गया है : मोहन भागवत

सावरकर जी का हिन्दुत्व, विवेकानंद का हिन्दुत्व ऐसा बोलने का फैशन हो गया है : मोहन भागवत

Newspoint24 / newsdesk / एजेंसी इनपुट के साथ 

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नई दिल्ली। वीर सावरकर : द मैन हू कैन्ड प्रिवेंटेड पार्टिशन " पुस्तक के विमोचन के अवसर पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि सरवरकर ने उस समय की स्थिति को देखते हुए हिंदुत्व पर व्याख्या करना आवश्यक समझा था।

उन्होंने कहा कि विनायक दामोदर सावरकर को "जानबूझकर बदनाम करने का प्रयास" किया गया था। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि "असली लक्ष्य एक व्यक्ति नहीं बल्कि भारत का राष्ट्रवाद था"। 

द मैन हू कैन्ड प्रिवेंटेड पार्टिशन " पुस्तक उदय माहूरकर और चिरायु पंडित द्वारा लिखी गई है। 

मोहन भागवत ने कहा कि सावरकर जी का हिन्दुत्व, विवेकानंद का हिन्दुत्व ऐसा बोलने का फैशन हो गया, हिन्दुत्व एक ही है, वो पहले से है और आखिर तक वो ही रहेगा। सावरकर जी ने परिस्थिति को देखकर इसका उद्घोष जोर से करना जरूरी समझा। 

भागवत ने कहा कि सावरकर को बदनाम करने की जानबूझकर कोशिश की गई । उन्होंने कहा, "लेकिन असली निशाना कोई व्यक्ति नहीं बल्कि भारत का राष्ट्रवाद था।  

उन्होंने कहा, "मातृभूमि को एकजुट रखना हमारी जिम्मेदारी है।"   "योगी अरविंद ने कहा था कि आखिरकार, अखंड भारत अस्तित्व में आएगा। राम मनोहर लोहिया ने भी अखंड भारत के बारे में सपना देखा था," उन्होंने कहा हिंदू धर्म को एकता की शक्ति के रूप में संदर्भित करना होगा ।

इतने वर्षों के बाद अब हम जब परिस्थिति को देखते हैं तो ध्यान में आता है कि जोर से बोलने की आवश्यकता तब थी, सब बोलते तो शायद विभाजन नहीं होता।

  जो भारत का है, उसकी सुरक्षा, प्रतिष्ठा भारत के ही साथ जुड़ी है। विभाजन के बाद भारत से स्थलांतर करके पाकिस्तान में गए मुसलमानों की प्रतिष्ठा पाकिस्तान में भी नहीं है। जो भारत का है, वो भारत का ही है

 कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह (सेवानिवृत्त), जितेंद्र सिंह, पुरुषोत्तम रूपाला और अर्जुन राम मेघवाल मौजूद थे।


मोहन भागवत ने कहा कि अंग्रेजों को पता था कि उन्हें अपने अस्तित्व के लिए "विभाजन और शासन" करना होगा और राष्ट्र की संपत्ति को लूटा। उन्होंने कहा, "यह अंडमान की जेल में सावरकर का अनुभव था ।"

भागवत ने कहा, "मतभेद हमारे लिए स्वाभाविक है। फिर भी हम साथ चलते हैं, यह हमारा राष्ट्रवाद है।"

उन्होंने कहा कि मतभेदों के बावजूद सावरकर महात्मा गांधी के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थे ।

"जो लोग इसे नहीं समझते हैं वे अभी भी उन्हें बदनाम करने के लिए अभियान चला रहे हैं। गांधी और सावरकर पूरी तरह से विपरीत थे, लेकिन वे दोनों देश के प्रतिबद्ध सैनिक होने के एक गुण को साझा करते थे," ।
 

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