लोकतन्त्र तो भारत का स्वभाव है, भारत की सहज प्रकृति है : मोदी

Democracy is the nature of India, it is the nature of India: Modi

मोदी ने आजादी के अमृतकाल से लेकर आजादी के शताब्दी वर्ष

के बीच 25 वर्ष के दौरान देश में कर्त्तव्य को सर्वाधिक महत्व दिये

जाने का आह्वान करते हुए कहा, “अगले 25 वर्ष, भारत के लिए

बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसमें हम एक ही मंत्र को चरितार्थ कर

सकते हैं क्या - कर्तव्य, कर्तव्य, कर्तव्य।

Newspoint24/newsdesk / एजेंसी इनपुट के साथ 

  
शिमला।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद एवं देश के पीठासीन अधिकारियों का आज आह्वान किया कि आज़ादी के अमृत काल में अगले 25 साल तक सदनों में बार बार ‘कर्तव्य’ के मंत्र पर जोर दें तथा विधायी निकायों के सदनों में गुणवत्तापूर्ण परिचर्चा के लिए अलग से समय निर्धारित करें जिसमें मर्यादा, गंभीरता एवं अनुशासन हो तथा इससे स्वस्थ लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त हो।

  मोदी ने आज यहां संसद एवं विधानमंडलों के अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के शताब्दी सम्मेलन का नयी दिल्ली से वीडियो लिंक के माध्यम से उद्घाटन किया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की अध्यक्षता में 82वें पीठासीन अधिकारी सम्मेलन का आयोजन 16, 17 एवं 18 नवंबर को यहां हो रहा है। देश के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन की शुरुआत 1921 में हुई थी और पहला सम्मेलन शिमला में हुआ था। इसलिये शताब्दी सम्मेलन का आयोजन भी शिमला में किया जा रहा है।


सम्मेलन मेंदेश के सभी राज्यों के पीठासीन अधिकारी शामिल हुए
सम्मेलन में   बिरला के साथ राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, विधानसभा अध्यक्ष विपिन सिंह परमार, विधानसभा में विपक्ष के नेता मुकेश अग्निहोत्री ने भी संबोधित किया। सम्मेलन मेंदेश के सभी राज्यों के पीठासीन अधिकारी शामिल हुए।

 मोदी ने अपने संबोधन में सदन में नयी कार्यप्रणाली को लेकर अपना दृष्टिकोण साझा करते हुए कहा, “हमारे सदन की परम्पराएँ और व्यवस्थाएं स्वभाव से भारतीय हों, हमारी नीतियाँ, हमारे कानून भारतीयता के भाव को, ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के संकल्प को मजबूत करने वाले हों, सबसे महत्वपूर्ण, सदन में हमारा खुद का भी आचार-व्यवहार भारतीय मूल्यों के हिसाब से हो, ये हम सबकी ज़िम्मेदारी है।


उन्होंने पीठासीन अधिकारियों के समक्ष विचारणीय प्रश्न रखते हुए कहा, “क्या साल में 3-4 दिन सदन में ऐसे रखे जा सकते हैं जिसमें समाज के लिए कुछ विशेष कर रहे जनप्रतिनिधि अपना अनुभव बताएं, अपने समाज जीवन के इस पक्ष के बारे में भी देश को बताएं। आप देखिएगा, इससे दूसरे जनप्रतिनिधियों के साथ ही समाज के अन्य लोगों को भी कितना कुछ सीखने को मिलेगा।” उन्होंने कहा कि इससे रचनात्मक समाज के लोगों को भी राजनीतिज्ञों के प्रति नकारात्मक भाव को कम करके उनसे जुड़ने और स्वयं राजनीति से जुड़ने की प्रेरणा मिलेगी। इस प्रकार से राजनीति में बहुत परिवर्तन आएगा।


नए सदस्यों को सदन से जुड़ी व्यवस्थित ट्रेनिंग दी जाए
उन्होंने विधायी निकायों में परिचर्चा को स्वस्थ बनाने के लिए पीठासीन अधिकारियों को सुझाव देते प्रश्न किया, “हम गुणवत्तापूर्ण परिचर्चा के लिए भी अलग से समय निर्धारित करने के बारे में सोच सकते हैं क्या? ऐसी परिचर्चा जिसमें मर्यादा का, गंभीरता का पूरी तरह से पालन हो, वह राेजमर्रा की राजनीति से मुक्त हो और कोई किसी पर राजनीतिक छींटाकशी ना करे। एक तरह से वो सदन का सबसे स्वस्थ समय हो, स्वस्थ दिवस हो।” उन्होंने कहा कि सदन में ज्यादातर सदस्य पहली बार चुन कर आये होते हैं और उनमें जनता के मुद्दों को लेकर बहुत ऊर्जा होती है। सदन में ताज़गी लाने और नयी कार्यप्रणाली विकसित करने की जरूरत है। नए सदस्यों को सदन से जुड़ी व्यवस्थित ट्रेनिंग दी जाए। सदन की गरिमा और मर्यादा के बारे में उन्हें बताया जाए। हमें सतत संवाद बनाने पर बल देना होगा। राजनीति के नए मापदंड भी बनाने ही होंगे। इसमे सभी पीठासीन अधिकारियों की भूमिका भी बहुत अहम है।

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प्रधानमंत्री ने सदन की उत्पादकता को बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि इसके लिए नियमों में बदलाव के लिए एक समिति का गठन किया जाना चाहिए। हमारे कानूनों में व्यापकता तभी आएगी जब उनका जनता के हितों में सीधा जुड़ाव होगा। इसके लिए सदन में सार्थक चर्चा और परिचर्चा बहुत जरूरी है। सदन में युवा सदस्यों को, आकांक्षी क्षेत्रों से आने वाले जनप्रतिनिधियों को, महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा मौका मिलना चाहिए। उन्होंने तकनीक को भी प्रमुख स्थान दिये जाने पर बल देते हुए कहा, “वन नेशन-वन राशन कार्ड की तर्ज पर मेरा एक विचार ‘वन नेशन वन लेजिस्लेटिव प्लेटफॉर्म’ का है। एक ऐसा पोर्टल जो न केवल हमारी संसदीय व्यवस्था को जरूरी तकनीकी बल दे, बल्कि देश की सभी लोकतान्त्रिक इकाइयों को जोड़ने का भी काम करे।”

  मोदी ने आजादी के अमृतकाल से लेकर आजादी के शताब्दी वर्ष के बीच 25 वर्ष के दौरान देश में कर्त्तव्य को सर्वाधिक महत्व दिये जाने का आह्वान करते हुए कहा, “अगले 25 वर्ष, भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसमें हम एक ही मंत्र को चरितार्थ कर सकते हैं क्या - कर्तव्य, कर्तव्य, कर्तव्य।” उन्होंने कहा कि हर बात में कर्त्तव्य सर्वोपरि है। 50 साल की कार्यशैली में कर्त्तव्य को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सदनों में ये संदेश बार बार दोहराया जायेगा तो देश के नागरिकों पर इसका प्रभाव पड़ेगा। यह 130 करोड़ भारतीयों को कर्त्तव्य का बोध कराके देश को कई गुना बढ़ाने का मंत्र है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत के लिए लोकतन्त्र सिर्फ एक व्यवस्था नहीं है। लोकतन्त्र तो भारत का स्वभाव है, भारत की सहज प्रकृति है। उन्होंने कहा कि हमें आने वाले वर्षों में, देश को नई ऊंचाइयों पर लेकर जाना है, असाधारण लक्ष्य हासिल करने हैं। ये संकल्प ‘सबके प्रयास’ से ही पूरे होंगे। और लोकतन्त्र में, भारत की संघीय व्यवस्था में जब हम ‘सबका प्रयास’ की बात करते हैं तो सभी राज्यों की भूमिका उसका बड़ा आधार होती है।

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