शंकर-जयकिशन की जोड़ी के जयकिशन अभिनेता बनना चाहते थे ( पुण्यतिथि 12 सितंबर के अवसर पर )

शंकर-जयकिशन की जोड़ी के जयकिशन अभिनेता बनना चाहते थे ( पुण्यतिथि 12 सितंबर के अवसर पर )

newspoint 24 / newsdesk / एजेंसी इनपुट के साथ


 ( जयकिशन की पुण्यतिथि 12 सितंबर के अवसर पर )


मुंबई। भारतीय सिनेमा जगत में संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने अपने संगीतबद्ध गीतों के जरिये श्रोताओं के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी लेकिन इस जोड़ी के जयकिशन अपने करियर के शुरूआत दौर में संगीतकार नहीं बल्कि अभिनेता बनना चाहते थे।


जयकिशन का पूरा नाम जयकिशन दयाभाई पांचाल था। उनका जन्म 04 नवम्बर 1929 को गुजरात के वंसाडा में हुआ था। खूबसूरत शख्सियत के मालिक जयकिशन हालांकि हारमोनियम बजाने में निपुण थे और उन्होंने संगीत विशारद वाडीलालजी, प्रेम शंकर नायक और विनायक तांबे से शास्त्रीय संगीत की तालीम ली थी, लेकिन वह अभिनेता बनने की तमन्ना रखते थे। अपने इस सपने को पूरा करने के लिए जयकिशन ने बम्बई का रुख किया और संघर्ष के दिनों में मध्य बम्बई की एक फैक्ट्री में टाइमकीपर की नौकरी करने लगे। उसी दौरान सांताक्रूज में एक प्रसिद्ध निर्माता से मिलने के लिए उसके दफ्तर के बाहर इंतजार करते समय उनकी मुलाकात शंकर से हुई, जो उस समय राजकपूर के पिता प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के पृथ्वी थिएटर में तबला बजाने का काम करते थे और मौका मिलने पर कुछ छोटी-मोटी भूमिकाएं भी कर लेते थे।


शंकर ने जयकिशन को भी पृथ्वी थिएटर्स में काम करने का सुझाव दिया और उन्हें वहां हारमोनियम वादक की नौकरी दिला दी। राजकपूर ने 1948 में जब अपनी पहली फिल्म आग का निर्माण शुरु किया तो दोनों ही फिल्म के संगीतकार राम गांगुली के सहायक बन गए और उनकी संगीत रचना में सहायता की। उस समय राजकपूर और संगीतकार राम गांगुली के बीच कुछ गंभीर मतभेद हो गए। राजकपूर को अपनी अगली फिल्म बरसात के लिए नए संगीतकार की तलाश थी। राजककपूर ने संगीतकार के रूप में शंकर-जयश्किान को मौका देने का फैसला कर लिया।


फिल्म बरसात मे शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने जिया बेकरार है और बरसात में हमसे मिले तुम सजन जैसे गीतों के लिये सुपरहिट संगीत दिया। बरसात पहली फिल्म थी, जिसके लिए पहली बार .टाइटल गीत बरसात में तुमसे मिले हमसे मिले हम सजन हमसे मिले तुम और एक कैबरे गीत पतली कमर है तिरछी नजर है, लिखा गया। इस फिल्म की जबरदस्त कामयाबी के साथ ही शंकर-जयकिशन की गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी तथा गायक मुकेश और गायिका लता मंगेशकर के साथ फिल्म इतिहास की एक सर्वाधिक सफल टीम बन गई।

फिल्म बरसात की कामयाबी के बाद शंकर जयकिशन बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाने मे सफल हो गये । इसे महज एक संयोग ही कहा जायेगा कि फिल्म बरसात से ही गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी ने भी अपने सिने कैरियर की शुरूआत की थी। फिल्म बरसात की कामयाबी के बाद राजकपूर हसरत जयपुरी और शंकर जयकिशन की जोड़ी ने कई फिल्मो मे एक साथ काम किया।


आवारा और श्री 420 से शंकर-जयकिशन की ख्याति देश की सीमाओं को भी पार कर गई। आवारा का आवारा हूं या गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं और श्री 420 का मेरा जूता है जापानी, सोवियत संघ. चीन और पूर्वी यूरोपीय देशों के भी गीत बन गए।
शंकर जयकिशन की जोड़ी गीतकार हसरत जयपुरी और शैलेन्द्र के साथ काफी पसंद की गयी।शंकर .जयकिशन सर्वाधिक नौ बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।शंकर की जोड़ी जयकिशन के साथ वर्ष 1971 तक कायम रही।


शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने हिन्दी फिल्मों के स्वर्णिम युग में एकछत्र राज किया, जहां उन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं था। कहा जाता है कि पचास के दशक में वह पहले संगीतकार थे, जो अपनी एक फिल्म के लिए एक लाख रुपया लेते थे और रामानन्द सागर की फिल्म.आरजू. 1965.के लिए उन्होंने दस लाख रुपए की भारी भरकम राशि ली थी। 12 सितंबर 1971 को जयकिशन इस दुनिया को अलविदा कह गये।

हिन्दी फिल्म संगीत में जो मुकाम हासिल किया , आज भी कोई संगीतकार नहीं पहुंच सका

शंकर जयकिशन ने हिन्दी फिल्म संगीत में जो मुकाम हासिल किया। उस तक आज भी कोई संगीतकार नहीं पहुंच सका है। उन्होंने हिन्दी फिल्मों के स्वर्णिम युग में एकछत्र राज किया, जहां उन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं था। कहा जाता है कि पचास के दशक में वह पहले संगीतकार थे. जो अपनी एक फिल्म के लिए एक लाख रुपया लेते थे और रामानन्द सागर की फिल्म.आरजू. 1965.के लिए उन्होंने दस लाख रुपए की भारी भरकम राशि ली थी। एक बार उन्हें उस दौर के सबसे ज्यादा कमाई करने वाले अभिनेता से भी ज्यादा मेहनताना दिया गया था।

जयकिशन और शंकर की जोडी ने लगभग 170 से भी ज्यादा फिल्मों में संगीत दिया। उनकी कुछ उल्लेखनीय फिल्में हैं (बादल.1951), (नगीना.1951), (पूनम.1952), (शिकस्त.1953), (सीमा.1955), (बसंत बहार.1956), (चोरी-चोरी.1956), (नई दिल्ली.1956), (राजहठ.1956),(कठपुतली.1957), (यहूदी.1958), (अनाडी.1959), (छोटी बहन.1959),(कन्हैया.1959), (लव मैरिज.1959), (दिल अपना और प्रीत पराई.1960), (जिस देश में गंगा बहती है.1960),(जब प्यार किसी से होता है.1961),(जंगली.1961), (ससुराल.1961), (असली नकली.1962), (प्रोफसर.1962), (दिल एक मंदिर.1963), (हमराही.1963) (राजकुमार.1964), (आम्रपाली.1966), (सूरज.1966), (तीसरी कसम.1966), (ब्रह्मचारी.1968), (कन्यादान.1968) (,शिकार.1968),(मेरा नाम जोकर.1970),( अंदाज.1971), (लाल पत्थर.1971),(संन्यासी.1973)।

जयकिशन और शंकर को (चोरी.चोरी.1956), (अनाडी.1959), (दिल अपना और प्रीत पराई.1960), (प्रोफेसर.1963), (सूरज.1966), (ब्रह्मचारी.1966),( मेरा नाम जोकर.1970), (पहचान.1971) और (बेईमान.1972) के लिए नौ बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। अंतिम तीन पुरस्कार तो उन्हें लगातार तीन वर्ष तक मिले।

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