कृषि कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने दिए स्टे के संकेत ,कानून के मेरिट पर सवाल नहीं 

मुख्य  न्‍यायाधीश एसए बोबडे की अगुवाई वाली बेंच ने याचिकाओं पर सुनवाई की
कोर्ट ने केंद्र सरकार से  पूछा  कि क्या वह कानून को स्थगित करेगी  है या फिर वह इस पर रोक लगा दे ?
अदालत  ने किसान आंदोलन पर सरकार के विवाद निपटाने के तरीके पर भी  नाराजगी जताई

Newspoint24.com/newsdesk/

नई दिल्‍ली। शीर्ष अदालत में आज किसान आंदोलन पर अहम सुनवाई हुई  है  अदालत ने  कृषि कानूनों पर आज कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार को फटकार लगाई। कोर्ट ने केंद्र सरकार से  पूछा  कि क्या वह कानून को स्थगित करेगी  है या फिर वह इस पर रोक लगा दे ? शीर्ष अदालत ने कहा कि किसानों की चिंताओं को कमेटी के सामने रखे जाने की जरूरत है। अदालत  ने किसान आंदोलन पर सरकार के विवाद निपटाने के तरीके पर भी  नाराजगी जताई। इस सुनवाई में के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कई तिलमिलाते  सवाल भी पूछे।


सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायधीश एस ए बोबडे ने  कहा  की 'हम आज की सुनवाई बंद कर रहे हैं।' किसान मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पूरी। आदेश पारित किया जायेगा होगा यह  कब होगा ये नहीं बताया गया।

इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। तब चीफ जस्टिस बोले - हमें जल्दबाजी पर लेक्चर मत दीजिए। हमने बहुत समय दिया है।


कृषि कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे के संकेत दिए   


सुप्रीम कोर्ट ने कानून के अमल पर स्टे के संकेत दिए। अदालत ने कहा कि हम स्टे करेंगे जब तक कि कमेटी  के सामने बातचीत चल रही है। हम स्टे करने जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा कि हम नहीं समझते कि आपने सही तरह से मामले को हैंडल किया। कोर्ट ने कहा कि हम अभी कानून के मेरिट पर नहीं जा रहे हैं लेकिन हमारी चिंता मौजूदा ग्राउंड स्थिति को लेकर है जो किसानों के प्रदर्शन के कारण हुआ है।

किसान संगठनों के वकील दुष्यंत दवे ने अपनी बात पर कहा कि  हम 26 जनवरी को ट्रैक्टर मार्च नहीं करने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इतना महत्वपूर्ण कानून कैसे संसद में बिना बहस के ध्वनि मत से पास किया गया । दुष्यंत दवे के इस जबाब पर चीफ जस्टिस बोले  हमें खुशी हुई कि दवे ने ऐसा  कहा।

कोर्ट ने कहा कि हम प्रदर्शन के खिलाफ नहीं हैं लेकिन अगर कानून पर रोक लगा दी जाती है तो किसान क्या प्रदर्शन स्थल से अपने घर को लौट जाएंगे?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसान कानून वापस करना चाहते हैं जबकि सरकार मुद्दों पर बात करना चाहती है। हम अभी कमेटी  बनाएंगे और बातचीत जारी रहने तक कानून के अमल पर हम स्टे करेंगे।

कोर्ट ने कहा कि हम प्रस्ताव करते हैं कि किसानों के मुद्दों के समाधान के लिये  कमिटी बने। हम ये भी प्रस्ताव करते हैं कि कानून के अमल पर रोक लगे। इस पर जिसे दलील पेश करना है कर सकता है। 

चीफ जस्टिस ने हरीश साल्वे कहा कि  सबकुछ एक आदेश के जरिए हासिल नहीं किया जा सकता है। किसान कमिटी के पास जाएंगे। अदालत यह आदेश पारित नहीं कर सकती है कि नागरिक प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं। स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं और जाड़े में सफर कर रहे हैं।

हरीश साल्वे  ने कहा  अगर अदालत कानून पर रोक लगाती है तो किसान अपना आंदोलन वापस ले लें। इस पर चीफ जस्टिस बोले  किसान कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्हें अपनी समस्याओं को कमिटी के सामने कहने दें। हम कमिटी की रिपोर्ट फाइल करने के बाद कानून पर कोई फैसला करेंगे।

चीफ जस्टिस ने इस दौरान कहा कि  हमने  अपने इंटेशन को सबको साफ-साफ दिया है । हम इस मसले का सर्वमान्य समाधान चाहते हैं। यही वजह है कि हमने आपको पिछली बार (केंद्र सरकार) कहा था कि क्यों नहीं इस कानून को कुछ दिन के लिए स्थगित कर देते हैं? आप या तो समाधा हैं या फिर समस्या हैं।आप बताइए कि कानून पर रोक लगाएंगे या नहीं ? नहीं तो हम लगा देंगे।

चीफ जस्टिस एस ए बोबडे ने कहा कि  जिस तरह से प्रक्रिया चल रही है, हम उससे निराश हैं। उन्होंने अटार्नी जनरल से कहा कि शीर्ष अदालत सरकार के किसान आंदोलन को हैंडल करने के तरीके से बेहद नाराज है। अदालत ने कहा, 'हमें यह भी नहीं मालूम कि आपने कानून को पास करने से पहले किस तरह की प्रक्रिया का पालन किया।'


सुप्रीम कोर्ट में आज  कृषि कानूनों के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हुई । गौरतलब है कि डीएमके एमपी तिरुचि सिवा, आरजेडी सांसद मनोज कुमार झा ने तीनों कृषि कानूनों की वैधता पर सवाल उठाते हुए याचिका दाखिल की थी।

मुख्य  न्‍यायाधीश एसए बोबडे की अगुवाई वाली बेंच ने  याचिकाओं पर सुनवाई की । बता दें की केंद्र और किसान संगठनों के बीच अगली बैठक 15 जनवरी को होनी है, ऐसे में कोर्ट  की राय बेहद अहम  है। 6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। इसके अलावा बेंच में शामिल पीठ में जस्टिस एएस बोपन्ना और वी रामसुब्रमण्यम ने कहा था कि अगर सोमवार (11 जनवरी) को बताया जाता है कि चर्चा अभी भी जारी है, तो वह (कोर्ट) सुनवाई स्थगित कर देगा। इससे पहले, 17 दिसंबर 2020 को शीर्ष अदालत ने विरोध जताने को मौलिक अधिकार बताते हुए किसानों को हिंसा या किसी भी नागरिक के जीवन या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के बिना विरोध जारी रखने की अनुमति दी थी।

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