पढ़ें ऋषि पंचमी का महत्व ,मुहूर्त,पूजा विधि और व्रत कथा

पढ़ें ऋषि पंचमी का महत्व ,मुहूर्त,पूजा विधि और व्रत कथा

newspoint 24 / newsdesk / एजेंसी इनपुट के साथ 

 ऋषि पंचमी एक त्योहार नहीं है, बल्कि महिलाओं द्वारा सप्त ऋषियों का सम्मान करने के लिए मनाया जाने वाला उपवास का दिन है, जिसका अर्थ है सात ऋषि और रजस्वला दोष से शुद्ध होना ।

ज्योतिषाचार्य पं बेचन त्रिपाठी दुर्गामंदिर ,दुर्गाकुंड वाराणसी बताते हैं कि हिंदू धर्म शुद्धता को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है और शरीर और आत्मा की शुद्धता बनाए रखने के लिए सख्त दिशानिर्देश हैं। पूर्व समय में परंपरा के अनुसार महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान दूषित माना जाता था । मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को रसोई में खाना पकाने, किसी भी धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने और परिवार के किसी भी सदस्य को छूने की अनुमति नहीं थी । इन दिशानिर्देशों से बचने से रजस्वला दोष बनता है। रजस्वला दोष से मुक्ति पाने के लिए ऋषि पंचमी का व्रत करने की मान्यता रही है।

 पं बेचन त्रिपाठी के अनुसार ऋषि पंचमी के व्रत का विशेष महत्व बताया जाता है। मान्यता है जो व्यक्ति इस व्रत का श्रद्धा अनुसार पालन करता है उसे सारे दोषों से मुक्ति मिल जाती है। ये व्रत मुख्य तौर से सप्त ऋषियों को समर्पित होता है। कहा जाता है इस व्रत को करने से धन-धान्य, समृद्धि, संतान प्राप्ति की कामना भी पूरी हो जाती है। जानिए ऋषि पंचमी व्रत की पूजा विधि, मंत्र, कथा, मुहूर्त और महत्व।

ऋषि पंचमी मुहूर्त: पंचमी तिथि की शुरुआत 10 सितंबर को रात 09.57 बजे से हो जाएगी और इसकी समाप्ति 11 सितंबर को 07.37 पर होगी। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11.03 बजे से शुरू होकर दोपहर 01.32 बजे तक रहेगा। इस साल ये पर्व 11 सितंबर को मनाया जायेगा।


ऋषि पंचमी पूजा विधि:


-व्रत रखने वाले लोगों को इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर लेना चाहिए। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।
-फिर घर के पूजा ग्रह की अच्छे से सफाई कर लें।
-इसके बाद हल्दी से चौकोर मंडल बनाएं। फिर उस पर सप्त ऋषियों की स्थापना कर व्रत करने का संकल्प लें।
-इसके बाद सप्त ऋषियों की सच्चे मन से पूजा करें।
-पूजा स्थल पर एक मिट्टी के कलश की स्थापना करें।
-सप्तऋषि के समक्ष दीप, धूप जलाएं और गंध, पुष्प नैवेद्य आदि अर्पित कर व्रत की कथा सुनें।
-तत्पश्चात निम्न मंत्र से अर्घ्य दें-
‘कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥
दहन्तु पापं मे सर्वं गृह्नणन्त्वर्घ्यं नमो नमः॥
-व्रत कथा सुनने के बाद आरती करें और सप्तऋषि को मीठे पकवान का भोग लगाएं।
-इस व्रत में केवल एक बार रात के समय भोजन किया जाता है।
-ध्यान रखें कि व्रत रखने वाले लोगों को इस दिन पृथ्वी में पैदा हुए शाकादि आहार ही लेना चाहिए।

ऋषि पंचमी व्रत कथा:

पौराणिक काल में एक राज्य में ब्राह्मण पति पत्नी रहते थे। दोनों ही पति-पत्नी धर्म पालन में अग्रणी थे। उनका एक पुत्र और एक पुत्री थी। बेटी के विवाह योग्य होने पर उन्होंने उसका विवाह एक अच्छे कुल में करा दिया। लेकिन विवाह के कुछ ही समय बाद उनकी बेटी के पति की मृत्यु हो गई। पति की मृत्यु के बाद ब्राह्मण की बेटी अपने वैधव्य व्रत का पालन करने के लिए नदी किनारे एक कुटियाँ में रहने लगी। कुछ समय बाद ही विधवा बेटी के शरीर में कीड़े पड़ने लगे। बेटी के कष्ट को देखकर ब्राह्मणी मां रोने लगी और उसने अपने पति से बेटी की इस दशा का कारण पूछा। ब्राह्मण ने अपनी दिव्य शक्ति से अपनी बेटी के पूर्व जन्म को देखा तो उसे ज्ञात हुआ कि पूर्व जन्म में उसकी बेटी ने माहवारी के समय नियमों का पालन नहीं किया। इसी कारण उसकी ये दशा हो रही है। पिता द्वारा बताए जाने के बाद ही ब्राह्मण की पुत्री ने पूरे विधि विधान के साथ ऋषि पंचमी के व्रत का पालन शुरू कर दिया। जिसके पश्चात उसे अगले जन्म में पूर्ण सौभाग्य की प्राप्ति हुई। (यह भी पढ़ें- मकर राशि में शनि और गुरु की युति से बनेगा ‘नीचभंग राजयोग’, जानिए किसे होगा धन लाभ)


ऋषि पंचमी व्रत पूजा महत्व:

पुराने वक्त में महिलाओं के लिए माहवारी के समय पूजा-आराधना के कई नियम बताए गए थे और ऐसा कहा जाता था कि जो इन नियमों का पालन नहीं करेगा उन्हें दोष लगेगा। इस दोष के निवारण के लिए ही महिलाएं इस व्रत का पालन करती हैं। माना जाता है जो महिला इस व्रत का पालन करती है उसे न केवल दोषों से मुक्ति मिलती है बल्कि उन्हें संतान प्राप्ति और सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।

ऋषि पंचमी उद्यापन विधि:

माना जाता है कि अगर ये व्रत एक बार शुरू कर दिया जाए तो इसे हर वर्ष करना आवश्यक हो जाता है। फिर वृद्धावस्था में ही इस व्रत का उद्यापन किया जा सकता है। इस व्रत के उद्यापन के लिए ब्राहमण भोज करवाया जाता हैं। भोज के लिए सात ब्रह्मणों को सप्त ऋषि का रूप मानकर उन्हें वस्त्र, अन्न, दान, दक्षिणा दी जाती है।
 

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