चित्रकूट की पहाड़ियों में मिले दुर्लभ 25 लाख वर्ष पूर्व से 12000 साल पूर्व तक के चित्र और पत्थर से बने औजार

चित्रकूट की पहाड़ियों में मिले दुर्लभ 25 लाख वर्ष पूर्व से 12000 साल पूर्व तक के चित्र और पत्थर से बने औजार

 Newspoint24/newsdesk/एजेंसी इनपुट के साथ



चित्रकूट । चित्रकूट की विंध्य पर्वत श्रंखला, जहां हमें प्रागैतिहासिक काल से आधुनिक काल तक कि निरन्तरता देखने को मिलती हैं। ये निरन्तरता मानव युग की उत्तपत्ति से लेकर आज विकसित अवस्था में भी वैसे ही आगे बढ़ रही है। चाहे पाषाणयुग रहा हो, चाहे रामायण युग, चाहे वैदिक युग, चाहे मुगल काल और फिर चाहे अंग्रेजों का समय रहा, हमेशा मानव अपने पिछले समय से सीखकर आगे अपने परंपरागत मूल्यों को लेकर चलता है। ये उन दिनों की भाषा है जब मनुष्य विकास के शुरुआती दौर से गुजर रहा था और वो समय पाषाण युग था। हमारे चित्रकूट जनपद में पाषाणयुग के समय के वही प्राचीन शैलचित्र आज भी जीवंत रूप में मानव विकास की समझ और उसकी निरन्तरता को दर्शा रहे हैं।



चित्रकूट में भगवान राम ने काटा था वनवास

चित्रकूट में प्रभु श्रीराम, सीता और लक्ष्मण संग साढ़े बारह वर्षों का वनवास काटने के लिए चित्रकूट का चयन करने के प्रमाण यहां की आध्यात्मिक और प्राचीनता में रचे बसे हैं। जगह-जगह इसके प्रमाण मिलते भी हैं। जिम्मेदारों की उपेक्षा और अपनी धरोहरों के प्रति उदासीनता इन पर भारी पड़ रही है। चौरासी कोस की परिक्रमा में ये अवशेष बिखरे हैं, जिन्हें संजोने की जरूरत है।



सरहट स्थित शैलचित्रों का ऐतिहासिक महत्व

पुरातत्वप्रेमी और यूथ आइकॉन अनुज हनुमत ने बताया कि सरहट के समीप खम्भेश्वर घाटी के दोनों तरफ गुफाओं में शैलचित्रों पूरा पैनल है, जिसमें एक साथ तमाम जंगली पशुओं का झुंड दर्शित है। कुछ शैल चित्र धूप व संरक्षण के अभाव में खराब हो रहे हैं। इनके संरक्षण की महती आवश्यकता है। दक्षिण भाग में एक गुफा है। यह बहुत संकरी गुफा है। इसमें पहुंचना कठिन कार्य है। उनका मानना है कि पाठा का यह पूरा इलाका पुरातात्विक धरोहरों का भंडार है। इस पूरे इलाके का पुरातत्व विभाग द्वारा सर्वेक्षण व संरक्षण कराए जाने की आवश्यकता है।



पुरापाषाण काल (25 लाख वर्ष पूर्व से 12000 साल पूर्व तक) की संस्कृति के अवशेष उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, मिर्जापुर व प्रतापगढ़ के अलावा मध्य प्रदेश की विंध्यघाटी में मिले हैं। अब लगातार चित्रकूट जनपद में मानिकपुर के आस-पास भी शैलचित्र मिल रहें है, इन शैलचित्रों में सामूहिकता का भाव दर्शाया गया है। इसके साथ ही विंध्यघाटी में मिले अब तक के पुरापाषाणकाल के शैलचित्र से पूरी तरह मिलान कर रहें है। पहले भी चित्रकूट के सरहट में शैलचित्र मिल चुके हैं लेकिन पुरातत्व प्रेमी अनुज हनुमत और उनकी टीम ने इस स्थल के आस पास शैलचित्रों के कई नए और वृहद पैनल खोज निकाले हैं। फिलहाल पुरातत्व विभाग और इतिहासकारों ने अब तक जो निष्कर्ष निकाला है उससे यह शैल चित्र पुरापाषाण काल की ओर इशारा कर रहें है। मानिकपुर की घाटी और इलाहाबाद की बेलन घाटी भौगोलिक दृष्टि से भी समान है। जिससे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि चित्रकूट में पुरापाषण कालीन संस्कृति नहीं पनपी होगी। हालांकि अभी शोध का विषय है फिर भी शैलचित्रों के अंकन व सामूहिकता यहां पर पुरापाषाण युग की संस्कृति के होने का बल मिल रहा है।पुरापाषण काल के अब तक जितने भी शैलचित्र प्रमाणित हो चुके हैं उनमें सामूहिकता प्रधान है। इन शैल चित्रों में लोग अपनी भावनाएं प्रदर्शित करते थे जैसे आखेट करना, पालतू जानवरों को प्रदर्शित करना, भोजन की तलाश में टहलना आदि है। चित्रकूट में इनके साथ साथ युद्ध से जुड़े भी कई शैलाश्रय मिले हैं। यानी शैलचित्रों को लेकर जिस तरह की निरंतरता और विभिन्नता चित्रकूट में मिलती है फिलहाल ऐसा कहीं और नहीं देखने को मिला।

 



पुरातत्वप्रेमी और खोजकर्ता अनुज हनुमत ने बताया कि चित्रकूट में मौजूद हजारों वर्ष पुराने मानव सभ्यता से जुड़े निशान ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। विंध्य पर्वत श्रेणी से घिरे चित्रकूट के पाठा क्षेत्र अंतर्गत बांसा, चूल्हि, खाम्भा, करपटिया, मऊ गुरदरी, धारकुंडी, और मारकुंडी आदि स्थानों पर शैलचित्र भारी संख्या में मौजूद है। ये सभी शैलचित्र पुरापाषाणकालीन और पाषाणकालीन समयावधि के हैं। सबसे सब ज्यादा ध्यान देने वाली बात ये है की यहां मौजूद शैलचित्रों में कई तरह की विशेषता है। ग्रामीण परिवेश, जानवरों का शिकार, युद्ध, चक्रव्यूह रचना सहित कई अन्य विशेषताओं को खुद में समेटे चित्र हैं। कुछ स्थल ऐसे भी हैं जहां बहुतायत संख्या में पत्थर से बने टूल्स मिलते हैं। उक्त शैलचित्रों को देखकर ऐसा लगता है मानो आज हजारों वर्ष बाद भी हमारे पूर्वज हमसे कुछ कहना चाहते हैं। मानव सभ्यता की शुरुआत से जुड़े ये कोड बेहद महत्वपूर्ण हैं जिन्हें हम जल्द ही खो देंगे। इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में पत्थर और मिट्टी खनन हो रहा है जिसकी वजह से इन शैलचित्रों को नुकसान का खतरा बढ़ता जा रहा है। प्राचीन मानव इतिहास से जुड़ा ये जीवंत दस्तावेज आज भी सरंक्षण और संवर्धन के अभाव में नष्ट होने की दहलीज पर पहुंच गया है और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ रामनरेश पाल ने बताया कि सरहट स्थित शैलचित्र राज्य पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग द्वारा संरक्षित किए गए हैं। ये स्थल इतिहास और मानव संस्कृति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।

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